Kriya Aur Kriya ke Bhed in Hindi Grammar (क्रिया के भेद)

क्रिया परिभाषा (Kriya Definition in Hindi Grammar):

जिस शब्द से किसी काम का करना या होना प्रकट हो, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे-खाना, पीना, सोना, जागना, पढ़ना, लिखना, इत्यादि ।
संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण की तरह ही क्रिया भी विकारी शब्द है । इसके रूप लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार बदलते रहते हैं ।

Dhatu in Hindi Grammar – धातु:

जिस मूल शब्द से क्रिया का निर्माण होता है, उसे धातु कहते हैं। धातु में ना’ जोड़कर क्रिया बनायी जाती है ।
जैसे-




खा + ना = खाना
पढ़ + ना = पढ़ना
जा + ना = जाना
लिख + ना = लिखना।
शब्द-निर्माण के विचार से धातु भी दो प्रकार की होती हैं-
(1) मूल धातु और (2) यौगिक धातु ।

मूल धातु स्वतंत्र होती है तथा किसी अन्य शब्द पर आश्रित नहीं होती। जैसे-खा, पढ़, लिख, जा, इत्यादि ।
यौगिक धातु किसी प्रत्यय के संयोग से बनती है । जैसे-पढ़ना से पढ़ा, लिखना से लिखा, खाना से खिलायी जाती, इत्यादि ।

क्रिया के भेद (Kriya ke Bhed in Hinid Vyakaran)

कर्म, जाति तथा रचना के आधार पर क्रिया के दो भेद हैं

(1) अकर्मक क्रिया (Sakarmak Kriya)  तथा
(2) सकर्मक क्रिया  (Akarmak Kriya)

(1) अकर्मक क्रिया (Akarmak Kriya)जिस क्रिया के कार्य का फल कर्ता पर ही पड़े, उसे अकर्मक क्रिया (Akarmak Kriya) कहते हैं । अकर्मक क्रिया का कोई कर्म (कारक) नहीं होता, इसीलिए इसे अकर्मक कहा जाता है ।
जैसे-श्याम रोता है। वह हँसता है । इन दोनों वाक्यों में ‘रोना’ और ‘हँसना’ क्रिया अकर्मक हैं, क्योंकि यहाँ इनका न तो कोई कर्म है और न ही उसकी संभावना है । ‘रोना’ और ‘ हँसना।” क्रियाओं का फल कर्ता पर (ऊपर के उदाहरणों में ‘श्याम’ और ‘वह’ कर्ता हैं) ही पडता है ।

(2) सकर्मक क्रिया (Sakarmak Kriya)जिस क्रिया के कार्य का फल कर्ता पर न पड़कर किसी दूसरी जगह पड़ता हो, तो उसे सकर्मक क्रिया (Sakarmak Kriya) कहते हैं ।




सकर्मक क्रिया के साथ कर्म (कारक) रहता है या उसके साथ रहने की संभावना रहती है। इसीलिए इसे ‘सकर्मक” क्रिया कहा जाता है । सकर्मक अर्थात् कर्म के साथ । जैसे-राम खाना खाता है । इस वाक्य में खानेवाला राम है, लेकिन उसकी क्रिया ‘खाना’ (खाता है) का फल ‘खाना’ (भोजन) पर पड़ता है। एक और उदाहरण लें-वह जाता है । इस वाक्य में भी ‘जाना’ (जाता है) क्रिया सकर्मक है, क्योंकि इसके साथ किसी कर्म का शब्दत: उल्लेख न रहने पर भी कर्म की संभावना स्पष्ट रूप से प्रतीत होती है । ‘जाता है’ के पहले कर्म के रूप में किसी स्थान जैसे-घर, विद्यालय या पटना जैसे गन्तव्य स्थान की संभावना स्पष्ट है ।

कुछ क्रियाएँ अकर्मक और सकर्मक दोनों होती हैं । वाक्य में प्रयोग के आधार पर उनके अकर्मक या सकर्मक होने का ज्ञान होता है । जैसे
अकर्मक: उसका शरीर खुजला रहा है ।
सकर्मक: वह अपना शरीर खुजला रहा है ।
अकर्मक: मेरा जी घबराता है ।
सकर्मक: मुसीबत किसी को भी घबरा देती है ।

Akarmak Kriya se Sakarmak Kriya Banana
अकर्मक क्रिया से सकर्मक क्रिया बनाना:

1.एक अक्षरी या दो अक्षरी अकर्मक धातु में ‘लाना’ जोड़कर सकर्मक क्रिया बनायी जाती है । किंतु कहीं-कहीं धातु के दीर्घ स्वर को हृस्व तथा “ओकार” को “उकार” कर देना पड़ता है ।
जैसे-जीना-जिलाना, रोना-रुलाना

2.दो अक्षरी अकर्मक धातु में कहीं पहले अक्षर अथवा कहीं दूसरे अक्षर के हृस्व को दीर्घ करके ‘ना’ प्रत्यय जोड़कर भी सकर्मक क्रिया बनायी जाती है ।
जैसे-उडना-उड़ाना, कटना-काटना
3.दो अक्षरी अकर्मक धातु के दीर्घ स्वर को हृस्व करके तथा ‘आना’ जोड़कर सकर्मक क्रिया बनायी जाती है ।
जैसे-जागना-जगाना, भींगना-मिंगाना, आदि
किंतु कुछ ‘अकर्मक’ धातुओं के स्वर में बिना किसी बदलाव के ही ‘आना’ जोड़कर भी सकर्मक क्रियाएँ बनायी जाती हैं । जैसे-चिढ़ना-चिढ़ाना
4.दो अक्षरी अकर्मक धातुओं में ‘उकार’ को ‘ओकार’ तथा ‘इकार’ को ‘एकार’ में बदलकर तथा ‘ना’ जोड़कर भी सकर्मक क्रियाएँ बनायी जाती हैं। जैसेखुलना-खोलना, दिखना-देखना, आदि ।
5.तीन अक्षरी अकर्मक धातुओं में दूसरे अक्षर के हृस्व स्वर को दीर्घ करके तथा अंत में ‘ना’ जोड़कर सकर्मक क्रियाएँ बनायी जाती हैं ।
जैसे-उतरना-उतारना, निकलना-निकालना, उखड़ना-उखाड़ना, बिगड़ना-बिगाड़ना ।
6.कुछ अकर्मक धातुएँ बिना किसी नियम का अनुसरण किये ही सकर्मक में परिवर्तित की जाती हैं । जैसे-टूटना-तोड़ना, जुटना-जोड़ना ।

Sakarmak Kriya ke Bhed:
सकर्मक क्रिया के भेद-सकर्मक क्रिया के भी दो भेद हैं-
(1) एककर्मक तथा (2) द्विकर्मकः ।
(1) एककर्मक जिस क्रिया का एक ही कर्म (कारक) हो, उसे एककर्मक (सकर्मक) क्रिया कहते हैं जैसे-वह रोटी खाता है | इस वाक्य में ‘खाना” क्रिया का एक ही कर्म ‘रोटी’ है ।
(2) द्विकर्मकजिस क्रिया के साथ दो कर्म हों तथा पहला कर्म प्राणिवाचक हो और दूसरा कर्म निर्जीव हो अर्थात् प्राणिवाचक न हो । ऐसे वाक्य में प्राणिवाचक कर्म गौण होता है, जबकि निर्जीव कर्म ही मुख्य कर्म होता है । जैसे-नर्स रोगी को दवा पिलाती है। इस वाक्य में ‘रोगी” पहला तथा प्राणिवाचक कर्म है और ‘दवा’ दूसरा निर्जीव कर्म है ।

संरचना (बनावट के आधार पर क्रिया के भेद):

संरचना के आधार पर क्रिया के चार भेद हैं-
(1) प्रेरणार्थक क्रिया, (2) संयुक्त क्रिया, (3) नामधातु क्रिया तथा (4) कृदंत क्रिया




 (1) प्रेरणार्थक क्रिया– (Prernarthak Kriya) जिस क्रिया से इस बात का ज्ञान हो कि कर्ता स्वयं कार्य न कर किसी अन्य को उसे करने के लिए प्रेरित करता है, उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं ।
जैसे-बोलना- बोलवाना, पढ़ना- पढ़वाना, खाना- खिलवाना, इत्यादि ।
प्रेरणार्थक क्रियाओं के बनाने की निम्नलिखित विधियाँ हैं-
(a) मूल द्वि-अक्षरी धातुओं में ‘आना’ तथा ‘वाना’ जोड़ने से प्रेरणार्थक क्रियाएँ बनती हैं ।
जैसे-पढ़ (पढ़ना) – पढ़ाना – पढ़वाना
चल (चलना) – चलाना – चलवाना, आदि ।
(b) द्वि-अक्षरी धातुओं में ‘ऐ’ या ‘ओ’ को छोड़कर दीर्घ स्वर हृस्व हो जाता है।
जैसे – जीत (जीतना) – जिताना – जितवाना
लेट (लेटना) – लिटाना – लिटवाना, आदि ।
(c) तीन अक्षर वाली धातुओं में भी ‘आना’ और ‘वाना’ जोड़कर प्रेरणार्थक क्रियाएँ बनायी जाती हैं । लेकिन ऐसी धातुओं से बनी प्रेरणार्थक क्रियाओं के दूसरे ‘अ’ अनुच्चरित रहते है ।
जैसे-समझ (समझना) – समझाना – समझवाना
बदल (बदलना) – बदलाना – बदलवाना, आदि ।
(d) ‘खा’, ‘आ’, ‘जा’ इत्यादि एकाक्षरी आकारान्त ‘जी’, ‘पी’, ‘सी’ इत्यादि ईकारान्त, ‘चू’, ‘छू-ये दो ऊकारान्त; ‘खे’, ‘दे’, ‘ले’ और ‘से’-चार एकारान्त: ‘खो’, ‘हो’, ‘धो’, ‘बी’, ‘ढो’, ‘रो’ तथा ‘सो”-इन ओकारान्त धातुओं में ‘लाना’, ‘लवाना’, ‘वाना’ इत्यादि प्रत्यय आवश्यकतानुसार लगाये जाते हैं ।
जैसे- जी (जीना) – जिलाना – जिलवाना
 
(2) संयुक्त क्रिया (Sanyukat Kriya) दो या दो से अधिक धातुओं के संयोग से बननेवाली क्रिया को संयुक्त क्रिया कहते हैं ।
जैसे-चल देना, हँस देना, रो पड़ना, झुक जाना, इत्यादि ।

(3) नामधातु क्रिया–(Nam Dhatu Kriya) संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण इत्यादि से बननेवाली क्रिया को नामधातु क्रिया कहते हैं।
जैसे-हाथ से हथियाना, बात से बतियाना, दुखना से दुखाना, चिकना से चिकनाना, लाठी से लठियाना, लात से लतियाना, पानी से पनियाना, बिलग से बिलगाना, इत्यादि । ये संज्ञा या विशेषण में “ना” जोडने से (जैसे-स्वीकार-स्वीकारना, धिक्कार-धिक्कारना, उद्धार-उद्धारना, इत्यादि) तथा हिंदी शब्दों के अंत में ‘आ’ करके और आदि ‘आ’ को हृस्व करके (जैसे-दुख-दुखाना, बात—बतियाना, आदि) बनायी जाती हैं ।

(4) कृदंत क्रिया-(Kridant Kriya) कृत्-प्रत्ययों के संयोग से बनने वाले क्रिया को कृदंत क्रिया कहते हैं; जैसे – चलता, दौड़ता, भगता हँसता.

प्रयोग के आधार पर क्रिया के अन्य रूप:

(1) सहायक क्रिया (Sahayak Kriya)
(2) पूर्वकालिक क्रिया (Purvkalik Kriya)
(3) सजातीय क्रिया (Sajatiya Kriya)
(4) द्विकर्मक क्रिया (Dvikarmak Kriya)
(5) विधि क्रिया (Vidhi Kriya)
(6) अपूर्ण क्रिया (Apurn Kriya)
(a) अपूर्ण अकर्मक क्रिया (Apurn Akarmak Kriya)
(b) अपूर्ण सकर्मक क्रिया (Apurn Sakarmak Kriya)

 

(1) सहायक क्रिया-(Sahayak Kriya) मुख्य क्रिया की सहायता करनेवाली क्रिया को सहायक क्रिया कहते हैं ।
जैसे- उसने बाघ को मार डाला ।

सहायक क्रिया मुख्य क्रियां के अर्थ को स्पष्ट और पूरा करने में सहायक होती है । कभी एक और कभी एक से अधिक क्रियाएँ सहायक बनकर आती हैं । इनमें हेर-फेर से क्रिया का काल परिवर्तित हो जाता है ।
जैसे- वह आता है ।
तुम गये थे ।
तुम सोये हुए थे ।
हम देख रहे थे ।
इनमे आना, जाना, सोना, और देखना मुख्य क्रिया हैं क्योंकि इन वाक्यों में क्रियाओं के अर्थ प्रधान हैं ।
शेष क्रिया में- है, थे, हुए थे, रहे थे– सहायक हैं। ये मुख्य क्रिया के अर्थ को स्पष्ट और पूरा करती हैं ।

(2) पूर्वकालिक क्रिया-(Purvkalik Kriya) जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त करके तत्काल किसी दूसरी क्रिया को आरंभ करता है, तब पहली क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं ।

जैसे- वह गाकर सो गया।
मैं खाकर खेलने लगा ।

(3) सजातीय क्रिया-(Sajatiya Kriya) कुछ अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं के साथ उनके धातु की बनी हुई भाववाचक संज्ञा के प्रयोग को सजातीय क्रिया कहते हैं । जैसे-अच्छा खेल खेल रहे हो । वह मन से पढ़ाई पढ़ता है । वह अच्छी लिखाई लिख रहा है ।

(4) द्विकर्मक क्रिया-(Dvikarmak Kriya) कभी-कभी किसी क्रिया के दो कर्म (कारक) रहते हैं । ऐसी क्रिया को द्विकर्मक क्रिया कहते हैं । जैसे-तुमने राम को कलम दी । इस वाक्य में राम और कलम दोनों कर्म (कारक) हैं ।

(5) विधि क्रिया-(Vidhi Kriya)जिस क्रिया से किसी प्रकार की आज्ञा का ज्ञान हो, उसे विधि क्रिया कहते हैं । जैसे-घर जाओ । ठहर जा।

(6) अपूर्ण क्रिया-(Apurn Kriya)जिस क्रिया से इच्छित अर्थ नहीं निकलता, उसे अपूर्ण क्रिया कहते हैं। इसके दो भेद हैं- (1) अपूर्ण अकर्मक क्रिया तथा (2) अपूर्ण सकर्मक क्रिया ।
(a) अपूर्ण अकर्मक क्रिया-(Apurn Akarmak Kriya) कतिपय अकर्मक क्रियाएँ कभी-कभी अकेले कर्ता से स्पष्ट नहीं होतीं । इनके अर्थ को स्पष्ट करने के लिए इनके साथ कोई संज्ञा या विशेषण पूरक के रूप में लगाना पड़ता है। ऐसी क्रियाओं को अपूर्ण अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे – वह बीमार रहा । इस वाक्य में बीमार पूरक है।
(b) अपूर्ण सकर्मक क्रिया(Apurn Sakarmak Kriya) कुछ संकर्मक क्रियाओं का अर्थ कर्ता और कर्म के रहने पर भी स्पष्ट नहीं होता । इनके अर्थ को स्पष्ट करने के लिए इनके साथ कोई संज्ञा या विशेषण पूरक के रूप में लगाना पडता है । ऐसी क्रियाओं को अपूर्ण सकर्मक क्रिया कहा जाता है ।
जैसे-आपने उसे महान् बनाया । इस वाक्य में ‘महान् पूरक है.




Karak in Hindi Grammar (कारक)

Karak in Hindi (कारक की परिभाषा) –

परिभाषा- संज्ञा ( या सर्वनाम ) के जिस रूप से उसका संबंध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ अभिव्यक्त होता है, उस रूप को कारक कहते हैं। जैसे-भगवान राम ने खारे जल के समुद्र पर बंदरों से पुल बँधवा दिया है ।

इस वाक्य में ‘भगवान राम ने’, ‘समुद्र पर’, ‘बंदरों से’ और ‘पुल’ संज्ञा-शब्दों के रूपांतर हैं, जिनके द्वारा इन संज्ञाओं का संबंध ‘बैंधवा दिया” क्रिया के साथ अभिव्यक्त होता है । इसलिए इन संबंधों को संज्ञाओं के कारक कहते हैं ।

कारक सूचित करने के लिए संज्ञा या सर्वनाम के बाद जो प्रत्यय लगाये जाते हैं, उन्हें विभक्तियाँ कहते हैं । विभक्तियों के योग से बने हुए रूप को विभक्त्यंत पद या विभक्त्यंत शब्द कहते हैं ।

Karak ke Bhed (कारक के भेद):-

हिंदी व्याकरण के अनुसार कारक के आठ भेद हैं-

1. कर्ता कारक (Karta Karak)
2. कर्म कारक (Karm Karak),
3. करण कारक (Karan Karak),
4. संप्रदान कारक (Sampradan Karak),
5. अपादान कारक (Apadan Karak),
6. संबंध कारक (Sambandh Karak),
7. अधिकरण कारक (Adhikaran Karak),
8. संबोधन कारक (Sambodhan Karak)।

1. कर्ताकारक (Karta Karak) –  किसी वाक्य में प्रयुक्त जिस शब्द से काम करनेवाले का बोध होता है, उसे कर्ताकारक कहते हैं। इसकी विभक्ति ‘ने’ तथा शून्य है ।
जैसे- उसने खाया । राम खाता है । सीता खाती है । राम ने खाया ।
इन वाक्यों में ‘उसने’, ‘राम’, ‘सीता’ और ‘राम ने’ कर्ताकारक हैं ।
पहले और चौथे वाक्य में सर्वनाम और संज्ञा के साथ ‘ने’ विभक्ति लगी है, जबकि दूसरे और तीसरे वाक्य में ‘ने’ विभक्ति लुप्त है । लेकिन, इन वाक्यों में भी ‘राम’ और ‘सीता’ के द्वारा खाने की क्रिया संपन्न होती है, अत: ये भी कर्ताकारक ही हैं। कर्ताकारक को पहचानने के लिए ‘कौन करता है ?’ प्रश्न पूछना चाहिए । इस प्रश्न का जो उत्तर मिलेगा, वही कर्ताकारक होगा ।

2. कर्मकारक (Karm Karak) – वाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता है, उसे कर्मकारक कहते हैं। अर्थात् कर्ता द्वारा किये गये काम का फल जिस शब्द पर पड़ता है, उसे कर्मकारक कहते हैं। इसकी विभक्ति ‘को’ और शून्य है ।
जैसे-कृष्ण ने कस को मारा । मोहन रोटी खाता है ।
पहले वाक्य में कृष्ण द्वारा ‘मारने’ की क्रिया का फल ‘कंस’ पर पडता है । अत: ‘’कंस’ को’ कर्मकारक है । इसी प्रकार दूसरे वाक्य में ‘मोहन’ के ‘खाने’ की क्रिया का फल ‘रोटी’ पर पड़ता है, अत: इस वाक्य में ‘रोटी’ कर्मकारक है । लेकिन, यहाँ रोटी के साथ ‘को’ विभक्ति नहीं लगी है ।
बुलाना, सुलाना, कोसना, पुकारना, जमाना, भगाना आदि क्रियाओ का प्रयोग करते समय यदि कर्मसंज्ञा हो, तो ‘कर्म’ के साथ ‘को’ विभक्ति निश्चित रूप से लगती है
जैसे-राम को बुलाओ । बच्चे को सुलाओं । कर्म के साथ विभक्ति के रहने पर क्रिया सदैव पुलिंग होगी, किन्तु जब कर्म विभाक्तिरहित होता है तब क्रिया कर्म के अनुसार ही होगी.
जैसे- मोहन ने पुस्तक को पढ़ा (कम विभक्ति सहित) । राम ने पुस्तक पढ़ी (कर्म विभक्तिरहित) ‘मारना” क्रिया के दो अर्थ हैं – ‘पीटना’, तथा ‘शिकार करना’
पीटने के अर्थवाली मरना क्रिया के साथ कर्म की विभक्ति लगती है, जबकि ‘शिकार करना’ अर्थवाली ‘मारना” क्रिया के साथ कर्म-विभक्ति नहीं लगती है । जैसे-लोगों ने गुंडे को मारा ।
जब विशेषण का प्रयोग संज्ञा के रूप में होता है, तब कर्म –विभक्ति ‘को’ अवश्य लगती है. – जैसे- बडों को सम्मान दो

3. करणकारक (Karan Karak) – वाक्य में जिस शब्द से क्रिया के संपन्न होने का बोध हो, उसे करणकारक कहते हैं । अर्थात् जिसके द्वारा या जिसकी सहायता से क्रिया की जाती है या कोई काम किया जाता है, उसे करणकारक कहा जाता है । इसकी विभक्ति ‘से’, ‘द्वारा’, ‘ के द्वारा’, ‘ के जरिये’ इत्यादि हैं । जैसे- राम ने रावण को बाण से मारा ।
करणकारक का क्षेत्र अन्य सभी कारकों से बड़ा है । करणकारक में अन्य सभी कारकों से बची हुई विभक्तियाँ या पद आ जाते हैं ।

4. संप्रदानकारक (Sampradan Karak) – जिसके लिए काम किया जाय, उसे संप्रदानकारक कहते हैं । अर्थात् कर्ता जिसके लिए काम करता है या जिसे कुछ देता है, उसे ही संप्रदानकारक कहा जाता है । इसकी विभक्तियाँ हैं- को, के लिए । इनके अतिरिक्त ‘के हित’, ‘के वास्ते’, ‘के निमित’ आदि अव्यय संप्रदानकारक की विभक्तियाँ हैं।
जैसे-नर्स रोगी के लिए दवा ला रही है ।
सोहन रमेश को पुस्तक देता है ।
जन-कल्याण के हित राम वन गये थे।
देश के निमित्त नेताजी ने यह त्याग किया ।
कर्मकारक और सम्प्रदानकारक – दोनों की विभक्ति ‘को’ है, लेकिन इनके अर्थो में अंतर होता है।
सम्प्रदानकारक:-
शरत भरत की धन देता है ।
सीता ने बच्चे को मिठाई दी ।

कर्मकारक:-
शरत भरत को पीटता है ।
सीता ने बच्चे को दुलारा ।

5. अपादानकारक (Apadan Karak) – संज्ञा के जिस रूप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट हो, उसे अपादानकारक कहते हैं। अर्थात् अपादानकारक से ‘जुदाई’ या ‘अलगाव’ का बोध होता है । इसकी विभक्ति ‘से’ है ।
जैसे- पेड से पत्ते गिरते हैं। इस वाक्य में पेड़ से पत्तों के गिरने का या अलग होने का भाव प्रकट होता है । अत:, ‘पेड़ से’, अपादानकारक है ।
‘से’ करणकारक और अपादानकारक दोनों की विभक्ति है । किंतु यह साधनरूप होने पर
करणकारक की विभक्ति होगा तथा अलगावसूचक होने पर अपादानकारक की विभक्ति के रूप में जाना जाएगा।

करणकारक अपादानकारक
वह डंडा के चोर को पीट रहा था पेड़ से आम टपका
राम अपनी कमाई से गरीबो को खाना खिलाता है लड़का घर से लौट आया

6. सम्बन्धकारक (Sambandh Karak) – संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी अन्य शब्द के साथ सम्बन्ध या लगाओ का बोध हो, उसे सम्बन्धकारक कहते हैं. सम्बन्धकारक की विभक्तियाँ का, की, के, रा, री, रे, हैं. इनमे से का, की, के विभक्तियाँ संज्ञा और सर्वनाम के साथ लगती हैं जबकि रा, री, रे केवल सर्वनाम के साथ आती हैं.
जैसे – यह राम का मकान है। वह मेरा घर है । यह आपकी गाड़ी है । यह हमारा देश है । संबंधकारक से अधिकार, कर्तव्य, कार्य-कारण, मोल-भाव, परिमाण, इत्यादि का बोध होता है ।
जैसे- अधिकार- आपकी गाड़ी, राम का मकान ।
कर्तव्य- तुलसीदास का रामचरितमानस, महादेवी वर्मा की कवितायें ।
कार्य-कारण- पीतल का लोटा, मिट्टी का घडा ।
मोल-भाव- दस रुपये का नमक, चालीस रुपये का प्याज ।
परिमाण- पाँच ग्राम की अँगूठी, दस किलोमीटर की दूरी, पाँच मीटर की साडी ।

7. अधिकरणकारक (Adhikaran Karak) – क्रिया के आधार को सूचित करनेवाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरणकारक कहते हैं । अधिकरण का शाब्दिक अर्थ है ‘आधार’ या ‘आश्रय’ । अत: अधिकरण से क्रिया के होने के स्थान या आधार का बोध होता है । इसकी विभक्तियाँ हैं- में, पै, पर ।
उदाहरण-बच्चा पलंग पर सोया है ।
कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध हुआ था ।
पहले वाक्य में ‘सोने’ का काम ‘पलंग पर’ हो रहा है जबकि दूसरे वाक्य में कुरुक्षेत्र में युद्ध होने का भाव प्रकाश्य है । अत: ‘पलंग’ और ‘कुरुक्षेत्र’ अधिकरणकारक हैं । कभी-कभी अधिकरणकारक की विभक्तियों का लोप हो जाता है तथा उनके बदले किनारे, आसरे, दिनों, यहाँ, वहां, समय इत्यादि पदों का प्रयोग किआ जाता है.
जैसे- इन दिनों वह दिल्ली है ।
वह प्रात:काल गंगा-किनारे जाता है ।
भिखारी द्वार-द्वार भीख माँगता है ।
चंदा के लिए हम दरवाजे-दरवाजे गये ।
जिस समय वे गा रहे थे, उस समय मैं सोया था । उस जगह नाटक होनेवाला था ।
कभी-कभार ‘में’ के अर्थ में ‘पर’ और ‘पर’ के अर्थ में ‘में’ का प्रयोग किया जाता है.
जैसे- उसके घर पर दो व्यक्ति हैं । (घर पर = घर में) ।
डोंगी जल में तैर रही थी । (जल में = जल पर) ।

8. संबोधनकारक (Sambodhan Karak) – संज्ञा के जिस रूप से किसी को बुलाने या पुकारने का भाव प्रकट होता है, उसे संबोधनकारक कहते हैं । संबोधनकारक की कोई विभक्ति नहीं होती । इसके चिह्न हैं-हे, अरे, रे, अजी, अहो । ये सभी पद संज्ञा के पहले आते हैं ।
जैसे- हे भगवान ! मुझे बचाओ ।
अरे राम ! जरा इधर आना ।
अजी सोहन ! तुम कहाँ जा रहे हो ?
इन वाक्यों में ‘हे भगवान’, ‘अरे राम !’ तथा ‘अजी सोहन !’ से पुकारने का या संबोधित करने का भाव स्पष्ट होता है । अत: ये सभी संबोधनकारक हैं ।

कर्ता की ने विभक्ति का प्रयोग:

कर्ता की ‘ने’ विभक्ति का प्रयोग निम्नांकित स्थितियों में किया जाता है:-
1. सकर्मक क्रिया के सामान्य भूतकाल, आसन्न भूतकाल, पूर्ण भूतकाल तथा संदिग्ध भूतकाल में कर्ता के ‘ने’ चिह्न का प्रयोग किया जाता है ।
जैसे- मैंने खाया, तुमने खाया है, राम ने खाया था, मोहन ने खाया होगा ।
2. ‘डालना’ या ‘देना” क्रिया के पहले कोई अकर्मक या सकर्मक क्रिया रहे, तो उपर्युक्त चारों भूतकालों में कर्ता का ‘ने’ चिह्न लगता है ।
जैसे- उसने हँस दिया। गुरुजी ने मेरे निबंध देख दिये । राम ने मेरी बिल्ली को मार डाला होगा ।
3. ‘सोचना’ और ‘समझना” क्रिया के चारों भूतकालों- सामान्य, आसन्न, पूर्ण और संदिग्ध- में विकल्प से कर्ता का ‘ने’ चिह्न आता है।
जैसे—उसने इस पर देर तक सोचा । उसने यह बात सोची ।
4. कर्म की उपस्थिति में ‘पुकारना” क्रिया के साथ भी पूर्वोत भूतकालों में कर्ता का ‘ने’ चिह्न लगता है । जैसे-राम ने तुम्हें पुकारा ।
5. थूकना, खाँसना, नहाना, छींकना इत्यादि अकर्मक क्रियाओं के साथ सामान्य, आसन्न, पूर्ण और संदिग्ध भूतकालों में कर्ता का ‘ने’ चिह्न आता है। जैसे-मैंने थूका। उसने नहाया है। सीता ने छींका था।
सोहन के खांसा होगा
6. कभी-कभी अकर्मक क्रिया भी सजातीय कर्म रहने पर सकर्मक बन जाती है । ऐसी दशा में पूर्वोक्त चारों भूतकालों में कर्ता का ‘ने’ चिह्न लगता है ।
जैसे- सिपाहियों ने अच्छी लडाई लडी । राम ने गहरी चाल चली । उसने अच्छी बोली बोली ।
7. आज्ञाबोधक क्रिया में भी कर्ता का ‘ने’ चिह्न लगता है ।
जैसे- पिताजी ने मुझे जाने न दिया । तुमने उसे कहने न दिया ।
8. हेतुहेतुमद् भूतकाल में भी कर्ता का ‘ने’ चिह्न आता है ।
जैसे- तुमने भरपेट खायाहोता, तो भूख से नहीं छटपटाते ।
9. जब संयुक्त क्रिया के दोनों खंड सकर्मक हों, हो अपूर्ण भूतकाल के अतिरिक्त सभी भूतकालों में कर्ता का ‘ने’ चिह्न आता है ।
जैसे- मैंने कह दिया । रघु ने खा लिया ।
10. प्रेरणार्थक क्रियाओं के साथ अपूर्ण भूतकाल के अतिरिक्त शेष सभी भूतकालों में कर्ता का ‘ने’ चिह्न आता है । जैसे- मैंने उसे सिखाया । मैंने भिखारी को कुछ पैसे दिलवाये ।

‘ने’ चिन्ह का प्रयोग कहाँ नही होता है:-
1. वर्तमान काल, अपूर्ण भूतकाल तथा भविष्यकाल में कर्ता के ‘ने’ चिन्ह का प्रयोग बिलकुल नही होता।
2. ‘बकना’, ‘बोलना’, ‘भूलना, ‘लाना’, ‘ले जाना’ यद्दपि सकर्मक क्रियाएं हैं, तथापि इनके साथ कर्ता का ‘ने’ चिन्ह नही प्रयुक्त होता है।
3. संयुक्त क्रिया के अंतिम खंड के अकर्मक होने पर उसके साथ कर्ता के ‘ने’ चिह्न का प्रयोग नहीं होता । जैसे- मैं गा चुका । वह जा चुका ।
4. जिन वाक्यों में लगना, जाना, सकना तथा चुकाना सहायक क्रियाओं का प्रयोग होता है, उनमें कर्ता का ‘ने’ चिह्न नहीं लगता । जैसे-वह खाना खाने लगा । वह बडी मुश्किल से सो सका । वह सारी मिठाई खा गया ।
एक वाक्य में कारक की सभी विभक्तियों का प्रयोग:-
हे भक्तजनो ! श्रीराम ने अयोध्या से लंका में जाकर सीता के लिए हनुमान तथा सुग्रीव आदि की सहायता से रावण की मारा था ।

Kaal Aur Kaal Ke Bhed | काल और काल के भेद

क्रिया के उस रूपांतर को ‘काल’ कहते हैं, जिससे क्रिया के होने का समय तथा उसकी पूर्ण या अपूर्ण अवस्था का बोध होता है ।
जैसे-वह खाता है । वह खा रहा है । वह खाता था । वह खा चुका था । वह खा रहा था।

काल के भेद (Kaal Ke Bhed)

काल के तीन मुख्य भेद हैं-
(1) वर्तमानकाल (Vartman Kaal)
(2) भूतकाल (Bhoot Kaal)
(3) भविष्यत्काल (Bhavishyat Kaal)

(1) वर्तमानकाल (Vartman Kaal)




क्रियाओं के होने की निरंतरता को वर्तमान काल कहते हैं । इस काल में क्रिया प्रारंभ हो चुकी होती है ।
जैसे-वह खाता है, वह खा रहा है ।
वर्तमानकाल के भेद – वर्तमानकाल के पाँच भेद हैं-
(a) सामान्य वर्तमानकाल (Samanya Vartman Kaal)
(b) तात्कालिक वर्तमानकाल (Tatkaalitk Vartman Kaal)
(c) पूर्ण वर्तमानकाल (Purn Vartman Kaal)
(d) संदिग्ध वर्तमानकाल (Sandigdh Vartman Kaal)
(e) संभाव्य वर्तमानकाल (Sambhavya Vartman Kaal)

a. सामान्य वर्तमानकाल (Samanya Vartman Kaal) – क्रिया के जिस रूप से क्रिया के वर्तमान काल में सामान्य रूप से संपन्न होने का बोध होता है, उसे सामान्य वर्तमान कहते हैं ।
अर्थात् सामान्य वर्तमान से यह ज्ञात होता है कि क्रिया का प्रारंभ बोलने के समय हुआ है। जैस-हवा चलती है। लड़का पुस्तक पढ़ता है ।

b. तात्कालिक वर्तमानकाल (Tatkaalitk Vartman Kaal) – तात्कालिक वर्तमान से यह ज्ञात होता है कि वर्तमानकाल में क्रिया हो रही है । अर्थात् बोलते समय क्रिया का व्यापार जारी है या चल रहा है। अत: इस क्रिया से इसकी पूर्णता का ज्ञान नहीं होता । इसीलिए तात्कालिक वर्तमान को अपूर्ण वर्तमान के नाम से भी जाना जाता है।
जैसे-गाडी आ रही है । हम कपड़े पहन रहे हैं । पत्र भेजा जा रहा है ।

c. पूर्ण वर्तमानकाल (Purn Vartman Kaal) पूर्ण वर्तमानकाल की क्रिया से ज्ञात होता है कि क्रिया का व्यापार ताईकल में पूर्ण हुआ है
जैसे – नकर आया है।
राम ने खाया है।
पत्र भेज गया ह

d. संदिग्ध वर्तमानकाल (Sandigdh Vartman Kaal) जिससे क्रिया के संपन्न होने में तो संदेह प्रकट हो, परंतु उसकी वर्तमानता में कोई संदेह नहीं हो ।
जैसे – गाड़ी आती होगी ।
वह खाता होगा ।
वह सोता होगा ।

e. संभाव्य वर्तमानकाल (Sambhavya Vartman Kaal) – संभाव्य वर्तमान में क्रिया के वर्तमानकाल में पूरा होने की संभावना रहती है । संभाव्य का अर्थ है संभावित अर्थात्, जिसके होने की संभावना या अनुमान हो ।
जैसे-वह चलता हो ।
राम गया हो ।
उसने खाया हो ।

(2) भूतकाल (Bhoot Kaal)




क्रिया के जिस रूप से कार्य की समाप्ति का ज्ञान हो, उसे भूतकाल की क्रिया कहते हैं ।
जैसे- वह आया था ।
उसने पढ़ा ।
वह जा चुका था !

भूतकाल के भेद – इसके छह भेद हैं-
(a) सामान्य भूत,
(b) आसन्न भूत,
(c) पूर्ण भूत,
(d) अपूर्ण भूत,
(e) संदिग्ध भूत
(f) हेतुहेतुमद् भूत

(a) सामान्य भूत – भूतकाल की जिस क्रिया से विशेष समय का बोध नहीं हो, उसे सामान्य भूतकाल की क्रिया कहते हैं । सामान्य भूतकाल की क्रिया से यह पता चलता है कि क्रिया का व्यापार बोलने या लिखने के पहले हुआ ।
जैसे-पानी गिरा । गाड़ी आयी। पत्र भेजा गया ।

(b) आसन्न भूत – क्रिया के जिस रूप से कार्य-व्यापार की समाप्ति निकट भूतकाल में या तत्काल ही उसके होने का भाव सूचित होता है, उसे आसन्न भूतकाल की क्रिया कहते हैं ।
जैसे-मैंने पढ़ा है ।
उसने दवा खायी है ।
वह चला है ।

(c) पूर्ण भूत – पूर्ण भूतकाल से ज्ञात होता है कि क्रिया के व्यापार को पूर्ण हुए काफी समय बीत चुका है । इसमें क्रिया की समाप्ति के समय का स्पष्ट ज्ञान होता है ।
जैसे-नौकर पत्र लाया था ।
राम ने लड्डू खाया था ।

(d) अपूर्ण भूत – अपूर्ण भूतकाल से यह ज्ञात होता है कि क्रिया भूतकाल में हो रही थी, उसका व्यापार पूरा नहीं हुआ था, लेकिन जारी था ।
जैसे-नौकर जा रहा था ।
गाडी आ रही थी ।
चिट्टी लिखी जाती थी ।

(e) संदिग्ध भूत – संदिग्ध भूतकाल में यह संदेह बना रहता है कि भूतकाल में क्रिया समाप्त हुई या नहीं ।
जैसे-उसने खाया होगा ।
वह चला होगा ।
राम ने पढ़ा होगा ।

(f) हेतुहेतुमद् भूत – हेतुहेतुमद् भूत से यह ज्ञात होता है कि क्रिया भूतकाल में होनेवाली थी, परन्तु किसी कारण से नहीं हो सकी ।
जैसे-मैं गाता ।
तू आता।
वह जाता ।
राम खाता ।
वह आता तो मैं जाता ।

(3) भविष्यत्काल (Bhavishyat Kaal)




भविष्य में होनेवाली क्रिया को भविष्यत्काल की क्रिया कहते हैं ।
जैसे-वह आज आयेगा । राम कल पढ़ेगा ।

भविष्यत्काल के भेद – भविष्यत्काल के तीन भेद हैं-
(a) सामान्य भविष्य,
(b) संभाव्य भविष्य और
(c) हेतुहेतुमद्भविष्य ।

(a) सामान्य भविष्य – सामान्य भविष्य से यह ज्ञात होता है कि क्रिया सामान्यत: भविष्य में संपन्न होगी ।
जैसे-मैं घर जाऊँगा ।
वह पढ़ेगा ।
तू खायेगा।
राम आयेगा ।

(b) संभाव्य भविष्य – इससे भविष्य में होनेवाली किसी क्रिया की संभावना का बोध तिा है ।
जैसे-मैं सफल होऊँगा ।
शायद माँ कल लौट आये ।
वह विजयी होगा ।

(c) हेतुहेतुमद्भविष्य-इसमें भविष्य में होनेवाली एक क्रिया दूसरी क्रिया के होने पर निर्भर रहती है ।
जैसे-वह गाये तो मैं भी गाऊँ ।
जो कमाये सो खाये ।
वह पढ़े तो सफल हो ।

Chhand in Hindi Grammar (छंद)

छन्द काब्य-रचना का मूल आधार है । छन्द के साँचे में ही ढ़लकर कविता पूर्णता को प्राप्त करती है । छन्दहीन रचना में काव्य के सौन्दर्य तथा सौष्ठव का प्राय: अभाव ही रहता है, अत: कविता को समझने तथा उसका भरपूर आनन्द लेने के लिए छन्द का ज्ञान आवश्यक हो जाता है ।

छोटी-बड़ी ध्वनियों का तोल-माप में बराबर होना छन्दबद्ध रचना के लिए एक आवश्यक शर्त है । ध्वनियों को बराबर करने के विशेष नियम हैं । इन नियमों में बँधी ध्वनियाँ ही लय उत्पन्न कर सकती हैं और इन्हीं नियमों में आबद्ध रचना को छन्द कहते हैं । अत: अक्षर, अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा, मात्रा-गणना तथा यति-गति आदि से सम्बन्धित विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्य-रचना छन्द कहलाती है

छंद के अंग:
1. चरण या पाद
2. मात्रा और वर्ण
3. लघु और गुरु
4. संख्या, क्रम तथा गण
5. यति
6. गति
7. तुक

1. चरण या पाद: चरण या पाद छंद की उस इकाई का नाम है जिसमे अनेक छोटी-बड़ी ध्वनियों का सन्तुलन किया जाता है । यह एक प्रकार से छन्द का ‘सन्तुलित खण्ड’ है, जिसके आधार पर शेष खण्डों का निर्माण किया जाता है । साधारणतया छन्द के चार चरण या पाद होते हैं । प्रत्येक चरण या पाद में वर्णों या मात्राओं की संख्या क्रमानुसार नियोजित रहती है । एक छन्द में चार से कम या अधिक चरण भी हो सकते हैं, पर ज्यादातर चार ही होते हैं । छन्द की स्थिति के आधारभूत अंश को ही पाद या चरण कहा जाता है।

2. मात्रा और वर्ण: किसी ध्वनि के उच्चारण में जो समय लगता है, उसकी सबसे छोटी इकाई को मात्रा कहते हैं । जैसे ‘क’ के उच्चारण की अपेक्षा ‘का’ के उच्चारण में दुगुना समय लगता है । इस प्रकार समय के आधार पर ‘क’ एक या हृस्व मात्रा है; परन्तु ‘का’ दो या दीर्घ मात्रा है । इस हिसाब से सभी हृस्व स्वरों की एक-एक मात्रा होती है तथा सभी दीर्घ स्वरों की दो-दो मात्राएँ मानी जाती हैं । मात्राओं की गिनती में व्यंजनों को नहीं गिना जाता, केवल स्वरों की ही मात्राएँ गिनी जाती हैं । उदाहरण के लिए ‘राजा’ में चार तथा ‘राज’ में तीन मात्राएँ हैं । वर्ण का अर्थ अक्षर भी है । एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं, फिर चाहे वह स्वर हृस्व हो या दीर्घ । जैसे- राजा’ और ‘राज’ शब्दों में दो-दो वर्ण हैं, जबकि उनमें मात्राओं का अन्तर है । इस प्रकार वर्ण की परिभाषा यही है कि हृस्व-दीर्घ आदि मात्राओं और साथ में जुड़े हुए व्यंजनों के विचार के बिना एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं।
उदाहरण- “अनुजबधू भगिनी सुतनारी” चरण में वर्ण तो 12 हैं, परन्तु मात्राएँ। 16 हैं । छन्द के विद्यार्थियों को वर्ण और मात्रा गिनने का विशेष अभ्यास कर लेना चाहिए ।
3. लघु और गुरु: छन्दशास्त्र में हृस्व स्वर को ‘लघु’ और दीर्घ स्वर को ‘गुरु’ कहते हैं। लघु में एक मात्रा होती है तथा इसका चिह्न ‘।’ है । गुरु में दो मात्रा होती है तथा इसका चिह्न ‘ऽ’ है ।
लघु तथा गुरु के नियम :
लघु- i. अ, इ, उ, ऋ-ये हृस्व स्वर हैं। इन स्वरों से जुड़े एक व्यंजन या संयुक्त व्यंजन को ‘लघु’ माना जाता है ‘क्रय’ और ‘कृषि’ में दोनों अक्षर लघु हैं । जैसे- सुभग; इसमें तीनों वर्ण लघु हैं।
ii हिन्दी छन्दों में चन्द्रविन्दुवाले हृस्व स्वर भी लघु माने जाते हैं । जैसे- ‘हँसना’ में ‘हँ’ लघु है ।
गुरु- (i) दीर्घ स्वर और उनसे मिले हुए व्यंजनों को भी गुरु कहते हैं। आ, ई, ऊ, ये दीर्घ स्वर हैं । रानी, मामा, दीदी, दूरी आदि सभी गुरु वर्ण हैं ।
(ii) संयुक्त स्वर एवं उनसे जुड़े व्यंजनों को भी गुरु माना जाता है । ए, ऐ, ओ, औये संयुक्त स्वर हैं, इनसे जुड़े होने के कारण, खे, खै, धो और पी सभी गुरु हैं।
(iii) अनुस्वार वाले सभी स्वर तथा अनुस्वार वाले सभी व्यंजन भी गुरु होते हैं । जैसे-मंद, हस में ‘में ‘ तथा ‘ह’ गुरु हैं ।
(iv) विसर्गान्त सभी वर्ण गुरु होते हैं। ‘दु:ख’ में ‘दु:’ और ‘विशेषत:’ में ‘त:’ गुरु हैं।
(v) एक शब्द में किसी द्वित्व या संयुक्त अक्षर से पहले का लघु अक्षर भी-यदि उसपर अधिक बल या भार पड़े तो-गुरु माना जाता है । जैसे- कुत्ता’ में “कु’ गुरु है।
4 संख्या, क्रम और गण: मात्राओं और वणों की गिनती की संख्या कहते हैं और कहाँ लघुवर्ण हो तथा कहाँ गुरु वर्ण हो-वणों के इस स्थितिक्रम को क्रम कहते हैं। संक्षेप में, किस छन्द में कितनी मात्राएँ या वर्ण हैं, यह उनकी संख्या है; और कहाँ लघु तथा कहाँ गुरु वर्ण हैं, यह उनका क्रम’ है । वणों की इस संख्या और क्रम को समझाने के लिए गणों की कल्पना की गयी है । तीन वणों का एक-एक गण मान लिया गया है । ये गण संख्या में आठ हैं- म, न, भ, य, ज, र, स, त । इन गणों के अनुसार ही मात्राओं का क्रम वर्णिक छन्दों में रहता है, इसीलिए इन्हें वर्णिक गण भी कहा जाता है। ‘ के हेर-फेर से छन्दों की रचना की जाती है।
5.यति: विराम या तनिक ठहरने को यति कहते हैं । छोटे छन्दों में आम तौर पर यति पाद के अन्त में होती है। परन्तु बड़े छन्दों में, जहाँ एक पाद में इतने अधिक अक्षर हों कि एक साँस में उनका उच्चारण कष्टकर हो, तो उनकी लय को ठीक रखने के लिए और उच्चारण करनेवाले को साँस लेने की सुविधा देने के लिए एक पाद में ही एक, दो या तीन विराम तक रखे जाते हैं । प्रारंभ में उच्चारण की सुविधा के लिए किया गया यह यति-विधान धीरे-धीरे छन्द के लक्षण का एक आवश्यक अंग बन गया ।
अनेक छन्द ऐसे हैं, जिनमें यति-भेद छन्द-भेद का कारण बन गया ।
6 गति: गीति-प्रवाह को गति कहते हैं। वर्णवृत्तों में इसकी कोई विशेष अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि गीति-प्रवाह लघु-गुरु वणों के स्थिति-क्रम के नियत कर देने से ही पैदा हो जाता है। परन्तु मात्रिक छन्दों में इसकी ओर विशेष ध्यान देना पड़ता है। हिन्दी के छन्द अधिकांशत: मात्राछन्द हैं। इनमें मात्राओं की संख्या ही छन्द का प्रधान लक्षण है। यह भी स्पष्ट है कि मात्राओं की संख्या समान होने मात्र से ही गीति-प्रवाह नहीं चलता । चौपाई में सोलह मात्राएँ होती हैं । निम्नलिखित पाद में भी सोलह मात्राएँ हैं।
जब सकोप लखन वचन बोले (16 मात्राएँ)
परन्तु इस पाद में गति (रवानगी) नहीं है, अत: इसे चौपाई का पाद नहीं माना जा सकता । इसे यदि इस प्रकार बदल दें तब गीति-प्रवाह ठीक हो जाता है,
लखन सकोप वचन जब बोले (तुलसी)
7 तुक: तुक का छन्द या ध्वनि-सन्तुलन से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं है । यह छन्द शास्त्र का विषय न होकर साहित्यशास्त्र का विषय है । लेकिन हिन्दी में तुक का प्रयोग आरम्भ से होता चला आ रहा है। चरण के अन्त में वर्णों की आवृत्ति को ‘तुक’ कहते हैं । हिन्दी साहित्य में साधारणतया पाँच और चार मात्राओं का तुक मिलता है । संस्कृत छन्दों में तुक का महत्व नहीं है, परन्तु हिन्दी में तुक ही छन्द का प्राण है । कहीं पहले और तीसरे पाद का तुक मिलता है । दूसरा और चौथा पाद अतुक ही रहते हैं; जैसे- सोरठा में ।
कहीं दूसरे और चौथे पाद का तुक मिलता है। पहला और तीसरा पाद अतुक ही रहते हैं; जैसे- दोहा में ।

छन्द के भेद- (chhand ke bhed):

वर्ण और मात्रा के आधार पर छन्द के चार भेद हैं-
(1) वर्णिक छन्द,
(2) वर्णिक वृत्त,
(3) मात्रिक छन्द और
(4) मुक्तछन्द ।

(1) वर्णिक छन्द- केवल वर्ण-गणना के आधार पर रचे गये छन्द वर्णिक कहलाते हैं। वृत्तों की तरह इनमें गुरु-लघु का क्रम निश्चित नहीं होता । केवल वर्णसंख्या का ही निर्धारण रहता है । इनमें चार चरणों का होना भी अनिवार्य नहीं है । इनके दो भेद माने गये हैं-(1) साधारण और (2) दण्डक । 1 से 26 वर्ण तक के छन्द ‘साधारण’ और 26 से अधिके वर्णवाले छन्द ‘दण्डक’ होते हैं । हिन्दी के सुपरिचित छन्द घनाक्षरी (कवित), रूपघनाक्षरी और देवघनाक्षरी दण्डक भेद के अन्तर्गत आते हैं । ‘साधारण’ के अन्तर्गत ‘अमिताक्षर’ छन्द को लिया जा सकता है ।
(2) वर्णिक वृत- वर्णिक छन्द का ही एक क्रमबद्ध, नियोजित एवं व्यवस्थित रूप वर्णिक वृत्त होता है । वृत्त उस सम छन्द को कहते हैं, जिसमें चार समान चरण होते हैं विधान से नियोजित होने के कारण इसे गणबद्ध या गणात्मक छन्द भी कहा जाता है । संस्कृत साहित्य में ही विशेष रूप से वर्णिक वृत्तों का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है । सवैया भी वर्णिक वृत्त है । शार्दूल विक्रीडित, मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी, इन्द्रवज़ा, उपेन्द्रवज़ा,
(3) मात्रिक छन्द- मात्रा-गणना पर आधारित छन्द मात्रिक छन्द कहे जाते हैं। इनमें वणों की संख्या भिन्न हो सकती है, परन्तु उनमें निहित मात्राएँ नियमानुसार होनी चाहिए। वर्ण-संख्या को छोड़कर केवल मात्रा-संख्या पर आधारित होने के कारण इन छन्दों की प्रकृति वर्णवृत्तों की तुलना में अधिक मुक्त तथा तरल रही है । हिन्दी साहित्य में मात्रिक छन्दों का विशेष प्रभुत्व रहा है । दोहा, चौपाई, रोला, सोरठा, वीर, हरिगीतिका, कुण्डलिया, छप्पय इत्यादि प्रमुख मात्रिक छन्द हैं।
(4) मुक्त छन्द- मुक्त छन्द का प्रयोग हिन्दी काव्यक्षेत्र में एक विद्रोह का प्रतीक रहा है । इसे स्वच्छन्द छन्द भी कहा जाता है । चरणों की अनियमित,हैं, जिन्हें प्राचीन शास्त्रीय दृष्टि से विहित नहीं माना गया और मुक्त छन्द का प्रयोग करनेवाले कवियों पर नाना प्रकार के व्यंग्य-विद्रुप होते रहे । निराला और पन्त को मुक्त छन्द को हिन्दी काव्य में संस्थापित करने का श्रेय है । निराला ने मुक्त छन्द को इस प्रकार परिभाषित किया- मुक्त छन्द तो वह है, जो छन्द की भूमि में रहकर भी मुक्त है।
इस छन्द में कोई नियम नहीं है । केवल प्रवाह कवित छन्द का-सा जान पडता है। कहीं-कहीं आठ अक्षर आप-ही-आप आ जाते हैं । असल में मुक्त छन्द का समर्थक उसका प्रवाह (गति) ही है । वही उसे छन्द सिद्ध करता है और उसका नियमाहित्य उसकी मुक्ति ।
पादों की रचना के आधार पर छन्द के तीन भेद और हैं- 1. सम, 2. अर्धसम और 3. विषम ।
1. सम- जिन छन्दों के चारों पादों में एक ही लक्षण समान रूप से चरितार्थ हो, वे सम छन्द कहे जाते हैं । प्रयोग और संख्या की दृष्टि से हिन्दी साहित्य में इन्हीं सम छन्दों की प्रचुरता है ।
2. अर्धसम- जिन छन्दों का प्रथम पाद तृतीय पाद के समान हो और द्वितीय पाद चतुर्थ पाद के समान हो, उन्हें अर्धसम कहते हैं । हिन्दी में दोहा, सोरठों आदि छन्द इसी श्रेणी के हैं ।
3. विषम- जो न सम हों न अर्धसम, वे विषम कहलाते हैं । वस्तुत: अनियमित छन्दों को ही विषम कह दिया गया है । ऐसे छन्द कम ही प्रचलित हैं । इस छन्द का एक उदाहरण ‘छप्पय’ है ।

Alankar in Hindi Grammar (अलंकार)

Alankar in Hindi (अलंकार परिभाषा)

‘अलंकार’ शब्द में ‘अलम् और ‘कार’ दो शब्द हैं। ‘अलम्’ का अर्थ है, भूषण – जो अलंकृत या भूषित करे, वह अलंकार है । अलंकार काव्य का बाह्य शोभाकारक धर्म है।

जिस प्रकार आभूषण किसी स्त्री के नैसर्गिक सौन्दर्य को बढ़ा देते हैं, उसी प्रकार उपमा, रूपक आदि अलंकार काव्य की रसात्मकता को बढ़ा देतें हैं।




वास्तव में अलंकार वाणी के आभूषण हैं। इनकी सहायता से अभिव्यक्ति में स्पष्टता, भावों में प्रभावशीलता और प्रेषणीयता  तथा भाषा में सौन्दर्य आ जाता है। स्पष्टता और प्रभावोत्पादन के लिए वाणी अलंकार की सहायता लेती है । इसलिए काव्य में इनका महत्वपूर्ण स्थान है । काव्य में रमणीयता और चमत्कार लाने के लिए अलंकारों का प्रयोग आवश्यक तो है, पर अनिवार्य नहीं ।

Alankar ke Bhed | अलंकार के भेद:

शब्द और अर्थ को प्रभावित करने के कारण अलंकार मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं:

शब्दालंकार और अर्थालंकार

जो अलंकार शब्द और अर्थ दोनों को प्रभावित करते हैं, वे ‘उभयालंकार’ कहलाते हैं ।

इस प्रकार अलंकार के तीन भेद होते हैं-

(1) शब्दालंकार (Shabdalankar)
(2) अर्थालंकार तथा (Ardhalankar)
(3) उभयालंकार (Ubhyalankar)

( 1 ) शब्दालंकार जो अलंकार जब किसी विशेष शब्द की स्थिति में ही रहे और उस शब्द के स्थान पर कोई पर्यायवाची शब्द रख देने से उसका अस्तित्व न रहे, वह शब्दालंकार है।
ये अलंकार शब्दाश्रित होकर शाब्दिक चमत्कार का ही विशेष संवर्द्धन करते हैं। इसी प्रवृत्ति के आधार पर इन्हें शब्दालंकार कहा जाता है । इनके प्रमुख भेद इस प्रकार हैं-

अनुप्रास अलंकार (Anupras Alankar)
यमक अलंकार (Yamak Alankar)
पुनरुक्ति अलंकार (Punrukti Alankar)
वीप्सा अलंकार (Vipsa Alankar)
वक्रोक्ति अलंकार (Vkrokti Alankar) तथा
श्लेष अलंकार (Shlesh Alankar) इत्यादि ।




(2) अर्थालंकार जिस शब्द से जो अलंकार सिद्ध होता है यदि उस शब्द के स्थान पर उसका समानार्थी शब्द रख देने से भी वह अलंकार यथापूर्व बना रहे, तो अर्थालंकार कहलाता है ।

अर्थालंकार की संख्या सर्वाधिक है –
उपमा अलंकार (Upma Alankar)
अनन्वय अलंकार (Ananvay Alankar)
उपमेयोपमा अलंकार (Upmeyopma Alankar)
प्रतीप अलंकार (Prtip Alankar)
रूपक अलंकार (Rupak Alankar)
भ्रान्तिमान अलंकार (Bhrantiman Alankar)
संदेह अलंकार (Sandeh Alankar)
दीपक अलंकार (Deepak Alankar)
उत्प्रेक्षा अलंकार (Utpreksha Alankar)
अपहृति अलंकार (Aphriti Alankar)
अतिशयोक्ति अलंकार (Atishyokti Alankar) इत्यादि

(3) उभयालंकार – इसे शब्दार्थालंकार भी कहा जाता है । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि जो अलंकार शब्द और अर्थ दोनों के आश्रित रहकर दोनों को प्रभावित करते हैं, वे उभयालंकार कहलाते हैं । इस जाति के अलंकारों की संख्या सीमित है । संसृष्टि तथा संकर इसी जाति के अलंकार हैं ।

कुछ प्रमुख शब्दालंकार:

अनुप्रास अलंकार (Anupras Alankar) वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं। आवृत्ति का अर्थ है, दुहराना। इस अलंकार में किसी वर्ण या व्यंजन की एक बार या अनेक वणों या व्यंजनों की अनेक धार आवृत्ति होती है ।

उदाहरण -वर्ण की एक बार आवृत्ति:

हैं जनम लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता ।

इसकी पहली पत्ति में ‘ज’ की एक बार आवृत्ति तथा दूसरी पत्ति में ‘प’ की भी एक ही बार आवृत्ति हुई है ।

एक वर्ण की अनेक बार आवृति :

‘तरनि तनुजा तट-तमाल तरुवर बहु छाए।’
इसमें ‘त’ की अनेक बार आवृत्ति हुई है।

अनुप्रास में वणाँ की आवृत्ति का भी एक नियम है । या तो वे शब्द के प्रारंभ में, या मध्य में या अन्त में आते हैं, तभी अनुप्रास माने जायेंगे अन्यथा नहीं ।

अनुप्रास अलंकार के तीन भेद हैं

(1) वृत्यनुप्रास
(2) छेकानुप्रास तथा
(3) लाटानुप्रास ।

अनुप्रास अलंकार के कुछ और उदाहरण :

(क) दिनान्त था थे दिननाथ डूबते ।
सधेनु आते गृह ग्वाल-बाल थे ।। (‘दन’ तथा ‘ल’ की आवृत्ति)

(ख) मुदित महीपति मंदिर आए । सेवक सचिव सुमंत बुलाए ।
(‘म’ तथा ‘स’ की आवृत्ति)

सबै सहायक सबल कै, कोउ न निबल सहाय ।
पवन जगावत आग को दीपहिं देत बुझाय ।

कारज धीरे होतु है, काहे होत अधीर ।
समय पाय तरुवर फलैं, केतक सींचौ नीर ।

(ड) बड़ सुख सार पाओल तुआ तीरे ।
छोडइत निकट नयन बह नीरे ।




(च) जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहि विलोकत पातक भारी ।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्रक दुख रज मेरु समाना ।

(छ) प्रभुजी तुम दीपक हम बाती,
जाकी जोति बरे दिन राती ।

(ज) माधव कत तोर करब। बड़ाई ।
उपमा तोहर कहब ककरा हम, कहितहुँ अधिक लजाई ।

(झ) जय जय भारत-भूमि-भवानी !
अमरों ने भी तेरी महिमा बारंबार बखानी ।

(ज) फूली सरसों ने दिया रंग, मधु लेकर आ पहुँचा, अनंग,
वधू-वसुधा पुलकित अंग अंग, हैं वीर वेश में किन्तु कंत ।

(ट) अधर धरत हरि को परत होठ दीठि पट जोति ।
हरित रंग की बाँसुरी इन्द्र धनुष दुति होति ।

यमक अलंकार (Yamak Alankar)– सार्थक परन्तु भिन्न अर्थ का बोध करानेवाले शब्द की क्रमश: आवृत्ति को यमक कहते हैं । यमक शब्द का अर्थ है दो । अत: इस अलंकार में एक ही शब्द का कम-से-कम दो बार प्रयोग आवश्यक है । यह प्रयोग दो बार से अधिक भी हो सकता है।

उदाहरण-
(1 ) कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाई ।
उहि खाये बौरात नर, इह पाये बौराई ।

इस दोहा में एक ‘कनक’ का अर्थ ‘सोना’ है, तो दूसरे ‘कनक’ का अर्थ ‘ धतूरा’ ।

(2) उधौ जोग जोग हम नाहीं । – इस पंक्ति में पहले ‘जोग’ का अर्थ ‘योग’ तथा दूसरे ‘जोग’ का अर्थ ‘योग्य’ है।
एक ही शब्द का अनेक अर्थों में प्रयोग के उदाहरण :

(1) त्यों ‘रसखानि’ वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानि ।

(2) सारंग नयन बयन पुनि सारंग सारंग तसु सन्धाने ।
सारंग उपर उगल दुर्ड सारंग केलि करिए मधुपाने ॥

श्लेष अलंकार (Shesh Alankar)– जब श्लिष्ट शब्दों से अनेक अर्थों का बोध होता है, तब वहाँ श्लेष अलंकार होता है । ‘श्लिष्ट’ शब्द का अर्थ है मिला हुआ, चिपका हुआ या सटा हुआ । अत: श्लिष्ट शब्द का सामान्य अर्थ होता है ऐसा शब्द, जिसमें अनेक अर्थ मिले हुए या चिपके हुए हों।

उदाहरण-

‘रहिमन’ पानी राखिये बिन पानी सब सून।
पानी गये न उबरे, मोती, मानुस, चून ।

यहाँ एक ही शब्द ‘पानी’ का चमक, प्रतिष्ठा और जल- ये तीन अर्थ हैं, जिनका तम्बन्ध क्रमश: मोती, मनुष्य और चूना से होता है । अत: इस दोहा में श्लेष अलंकार है।

जो चाहो चटक न घटै, मैलो होय न मित्त ।
रज राजस न छुवाइये, नेह चीकने चित्त ।।

यहाँ ‘रज’ रजोगुण (अहंकार) तथा धूल और ‘नेह’ प्रेम (स्नेह) तथा तेल (स्निग्ध द्रव्य)- ये दो-दो अर्थ देते हैं । अत: यहाँ भी श्लेष अलंकार है ।

वक्रोति अलंकार (Vkroti Alankar) यदि वक्ता के कथन में उसके अभिप्रेत अर्थ के बदले श्रोता श्लेष या काकु से दूसरा अर्थ ग्रहण करे, तो वक्रोक्ति अलंकार होता है ।

वक्रोक्ति (वक्र + उक्ति) का सहज अर्थ है- टेढ़ा कथन ।

कहनेवाला किसी दूसरे अभिप्राय से जो कुछ कहे, सुननेवाला उसका दूसरा ही-वक्ता के अभिप्राय से सर्वथा भिन्न अर्थ समझ ले तो वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है ।

ऐसी अवस्था दो कारणों से संभव होती है-

(1) श्लेष की सहायता से तथा
(2) काकु की सहायता से ।

काकु का अर्थ है ध्वनि का विकार । काकु से किसी कथन के अर्थ में बड़ा भारी अन्तर आ जाता है। इसमें वक्ता के वाक्य से अर्थात् कण्ठध्वनि की विशेषता से श्रोता द्वारा अन्य अर्थ कल्पित कर लिया जाता है । इस प्रकार जो वक्रोक्ति श्लेष के द्वारा होती है, उसे श्लेष वक्रोक्ति तथा जो वक्रोक्ति काकु की सहायता से होती है, उसे काकु वक्रोक्ति कहते हैं ।

श्लेष वक्रोति के दो भेद हैं-
(1) सभग श्लेष वक्रोक्ति तथा
(2) अभग श्लेष वक्रोक्ति ।

उदाहरण (सभंग श्लेष वक्रोक्ति) :

अयि गौरवशालिनी, मानिनी, आज सुधास्मित क्यों बरसाती नहीं?
निज कामिनी को प्रिय, गौ अवशा अलिनी भी कभी कहि जाती कहीं ।’

इस छन्द में ‘गौरवशालिनी’ पद को ‘गी’, ‘अवशा’ और ‘अलिनी’ में भंग करके श्लेषार्थ निकलता है ।

उदाहरण (अभंग श्लेष वक्रोक्ति) :
‘एक कबूतर देख हाथ में पूछा कहाँ अपर है ?
उसने कहा अपर कैसा ? उड़ है गया। सपर है ।
इस छन्द में ‘अपर’ का अर्थ वक्ता के अनुसार ‘दूसरा’ है, जबकि श्रोता ने श्लेष की सहायता से अपर का अर्थ ‘पर-रहित’ लिया है ।

उदाहरण (काकु वक्रोक्ति) :

कोउ नृप होहिं हमहिं का हानी । चेरी छाँड़ि अब होब कि रानी ।

इस छन्द में काकु द्वारा यह समझाया जा रहा है कि किसी के राजा बनने या न बनने से वक्ता का कुछ भी बनने या बिगड़नेवाला नहीं है। हानि-लाभ तो उसी को झेलना है, जिससे यह बात कही जा रही है ।

वीप्सा अलंकार (Vipsa Alankar)आदर, घृणा, हर्ष, शोक, विस्मयादिबोधक भावों को प्रभावशाली रूप से व्यक्त करने के लिए शब्दों की पुनरावृत्ति को वीप्सा अलंकार कहते हैं।

उदाहरण :




‘रीझि -रीझि रहसि-रहसि हँसी-हँसी उठे,
साँसै भरि आँसू भरि कहत दई-दई ।

मोहि–मोहि मोहन को मन भयो राधामय
राधा मन मोहि-मोहि मोहन मयी-मयी । (देव)

या, मधुर-मधुर मेरे दीपक जल । (महादेवी)

मधुर-मधुर की आवृत्ति में वीप्सा अलंकार है । पहले छन्द सभी शब्द वीप्सा अलंकार के ही उदाहरण हैं ।

कुछ प्रमुख अर्थालंकार :

उपमा अलंकार (Upma Alankar) दो भिन्न पदार्थों में सादृश्य-प्रतिपादन को उपमा कहते हैं । ‘उपमा’ का अर्थ है एक वस्तु के निकट दूसरी वस्तु को रखकर दोनों में समानता प्रतिपादित करना । ‘उपमा’ शब्द का अर्थ ही है सादृश्य, समानता तथा तुल्यता इत्यादि । अलंकार के सौन्दर्य का मूल सादृश्य में है, और यही कारण है कि सादृश्यमूलक अलंकार ही प्रधान हैं । ‘उपमा’ इन समस्त सादृश्यमूलक अलंकारों का भी प्राण है, क्योंकि यह स्वत: सादृश्य है । उपमा अलंकार सर्वाधिक प्राचीन है । इसका प्रयोग ऋग्वेद में भी मिलता है ।

‘उपमा” अलंकार (Upma Alankar) के चार अंग होते हैं –

एक वाक्य है- ‘मुख चन्द्रमा-सा सुन्दर है ।’ इस वाक्य में ‘मुख’ की उपमा ‘चन्द्रमा’ से दी गयी है, अत: यह वाक्य उपमा अलंकर का उदाहरण है । इस वाक्य में ‘मुख’ की सुन्दरता की तुलना ‘चन्द्रमा’ की सुन्दरता से की गयी है, अत: ‘मुख’ ‘उपमेय’ है, ‘चन्द्रमा’ ‘उपमान’ है, ‘सा’ सादृश्यवाचक है तथा ‘सुन्दर’ साधम्र्य या समान गुण-धर्म है, जो उपमेय (मुख) तथा उपमान (चन्द्रमा) दोनों में समान रूप से विद्यमान है। इस प्रकार हम देखते हैं कि उपमेय, उपमान, सादृश्यवाचक तथा साधारण धर्म (या समान गुण-धर्म)-ये उपमा अलंकार के चार अंग हैं।

उपमेय अलंकार (Upmey Alankar) उपमेय का अर्थ है “उपमा देने के योग्य’-जिसकी समानता किसी दूसरी वस्तु से दिखायी जाय । ऊपर के उदाहरण में ‘मुख’ उपमेय है ।

उपमान अलंकार (Upman Alankar)  उपमेय की उपमा जिससे दी जाती है-उपमेय को जिसके समान बताया या दिखाया जाता है, उसे उंपमान कहते हैं । उपर्युक्त उदाहरण में ‘चन्द्रमा’ उपमान है ।

सादृश्यवाचक अलंकार (Sadrishyavachak Alankar)  उपमेय और उपमान में समानता बताने या दिखाने के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया जाता है, उसे सादृश्यवाचक कहते हैं । उपर्युक्त उदाहरण में ‘सा’ सादृश्यवाचक है। आवश्यकतानुसार सा, ऐसा, जैसा, सदृश, समान, तुल्य इत्यादि में से किसी भी शब्द का प्रयोग सादृश्यवाचक के लिए किया जा सकता है ।

साधारण धर्म (समान गुण-धर्म) अलंकार (Sadharan Dharm Alankar)  दो वस्तुओं के बीच में समानता प्रतिपादित करने के लिए किसी ऐसे गुण या धर्म की सहायता ली जाती है, जो दोनों में वर्तमान हो । इसी गुण या धर्म को साधारण धर्म (या समान गुण-धर्म) कहा जाता है । पूर्वोक्त उदाहरण में ‘सुन्दर’ साधारण धर्म है ।

उपमा” अलंकार के दो प्रमुख भेद हैं-

(1) पूर्णोपमा अलंकार (Purnotma Alankar) तथा
(2) लुप्तोपमा अलंकार (Luptotma Alankar)

( 1 ) पूर्णोपमा अलंकार (Purnotma Alankar) जब उपमा के चारों अंगों का शब्दत: उल्लेख हो, तब पूर्णापमा होती है । ‘मुख चन्द्रमा-सा सुन्दर है’ में पूणोपमा है, क्योंकि इसमें उपमा के चारों अंगों उपमेय (मुख), उपमान (चन्द्रमा), साधारण धर्म (सुन्दर) तथा सादृश्यवाचक (सा) का शब्दत: कथन है ।

निम्नलिखित उदाहरणों में भी पूर्णापमा है-

(i) सुनि सुरसरि सम पावन बानी ।
भई सनेह विकल सब रानी ।

(ii) राम-चरन-पंकज मन जासू ।
लुबुध मधुप इव तजै न पासू ।

(2) लुप्तोपमा अलंकार (Luptotma Alankar) जहाँ उपमा के चारों अंगों में से किसी एक (या अधिक) का शब्दत: कथन नहीं किया जाता, वहाँ लुप्तोपमा अलंकार होता है ।

उदाहरण- ‘सरद विमल बिधु बदन सुहावन ।’

इसमें सादृश्यवाचक का कथन नहीं किया गया है ।

या, ‘दोनों भैया मुखराशि हमें लौट आके दिखाओ।” (प्रियप्रवास-हरिऔध)

इसमें ‘वाचक’ तथा ‘ धर्म’ का कथन नहीं किया गया है, साथ ही उपमेय के धर्म की प्रधानता होने के कारण यहाँ ‘रूपक” नहीं माना जायेगा। ‘दिखाओ’ शब्द मुख की प्रधानता सिद्ध करता है। अत: इस पद में ‘वाचक-धर्मलुप्ता उपमा है।

रूपक अलंकार (Rupak Alankar) उपमेय में उपमान के निषेधरहित आरोप को रूपक अलंकार कहते हैं।

इसमें अत्यधिक समानता के कारण प्रस्तुत (उपमेय) में अप्रस्तुत (उपमान) का आरोप करके दोनों में अभिन्नता अथवा समानता दिखायी जाती है । ‘रूपक’ का कोशीय अर्थ हैएकता अथवा अभेद की प्रतीति ।

उदाहरण- ‘बीती विभावरी जाग री |

अम्बर-पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा-नागरी ।

यहाँ अम्बर में पनघट, तारा में घट तथा ऊषा में नागरी (नायिका) का आरोप है, अत: इस पंक्ति  में रूपक अलंकार है ।

रूपक अलंकार के तीन मुख्य भेद हैं-

  1. सांग रूपक,
  2. निरंग रूपक तथा
  3. परम्परित रूपक । ऊपर के उदाहरण में सांग रूपक अलंकार है ।

उत्प्रेक्षा अलंकार (Utpreksha Alankar) – जहाँ प्रस्तुत में अप्रस्तुत की सम्भावना होती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । उपमा अलंकार की तरह उत्प्रेक्षा अलंकार में भी कहीं वाचक शब्द रहता है और कहीं नहीं भी रहता है । इसके वाचक शब्द हैं- मनु, इव, मानो, जानो इत्यादि ।

जहाँ वाचक शब्द होता है, वहाँ वाच्या उत्प्रेक्षा होती है । जहाँ वाचक नहीं होता, वहाँ प्रतीयमाना या गम्या उत्प्रेक्षा होती ।

उत्प्रेक्षा अलंकार के भी अनेक भेद-प्रभेद हैं । परन्तु इसके तीन मुख्य भेद हैं-




  1. वस्तृत्प्रेक्षा अलंकार
  2. फलोत्प्रेक्षा अलंकार तथा
  3. हेतृत्प्रेक्षा अलंकार ।

उदाहरण :

सोहत ओढे . पीतु पटु, स्याम सलौने गात

मनौ नीलमनि सैल पर, आतपु रयो प्रभात

यहाँ पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण पर नीलमणि पर्वत पर प्रात:कालीन धूप का आरोप है। यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है ।

लता भवन ते प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ ।

निकसे मनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ

लता-भवन से दोनों भाइयों (राम-लक्ष्मण) के निकलने पर बादलों के पटल (पर्दा) से दो चन्द्रमाओं के निकलने का आरोप है । अत: यहाँ भी उत्प्रेक्षा अलंकार है । इन दोनों उदाहरणों में वाचक शब्दों (मनी, मनु) का भी कथन है, अत: इनमें वाच्या उत्प्रेक्षा है ।

अतिशयोक्ति अलंकार (Atishyokti Alankar) –अतिशयोक्ति का शाब्दिक अर्थ है अतिशय + उत्ति अर्थात् बढ़ा-चढ़ाकर किया गया कथन । उपमेय को छिपाकर उपमान के साथ उसकी आभन्नता (या समरूपता) की प्रतीति कराना ही अतिशयोक्ति अलकार है । इसमें उपमेय का नामोल्लेख तक नहीं किया जाता, अपितु उपमान के द्वारा ही उसकी प्रतीति कराई जाती है।

उदाहरण-

बाँधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से ।
मणिवाले फणियों का मुख, क्यों भरा हुआ हीरों से ।

इन पंक्तियों में कवि ने मोतियों से भरी हुई प्रिया की माँग का वर्णन किया है ।

विधु (चन्द्र) से मुख का, काली जंजीरों से बालों का तथा मणिवाले फणियों से मोती भरी माँग की प्रतीति होती है । इन पंक्तियों में उपमेय मुख, बाल तथा माँग का नामोल्लेख तक नहीं है । उपमानों (विधु, काली जंजीरों तथा मणिवाले फणियों) से ही उपमेय की प्रतीति होती है ।

अन्योक्ति जब कोई बात सीधे-सीधे न कहकर घुमा-फिराकर कही जाती है, तब वहाँ अन्योति अलंकार होता है । अन्योति को ही पर्यायोति के नाम से भी जाना जाता है । इसमें वक्ता को जो कुछ भी कहना होता है, उसे सीधे-सादे ढंग से स्पष्ट रूप से न कहकर घुमा-फिराकर कहा जाता है । जैसे-किसी आगन्तुक से जब यह कहा जाता है’आपने कैसे कृपा की ?’ तब वक्ता का अभीष्ट अर्थ यह पूछना होता है कि ‘आप किस मतलब से आये हैं ?’

उदाहरण-

नहिं पराग नहीं मधुर मधु नहिं विकास इहिं काल ।
अली कली ही सौं बंध्यौ, आगे कौन हवाल ।

इस दोहे में कली और भेंवरे के माध्यम से नवविवाहित राजा जयसिंह को अपने कर्तव्य का स्मरण कराया गया है ।

‘तुलसी अवलम्ब न और कछू लरिका केहि भाँति जिआइहौं जू ।
बरु मारिये मोहिं बिना पग धोये हौं नाथ न नाव चढ़ाइहौं जू ॥

इन पत्तियों में केवट का इष्टार्थ प्रकारान्तर से व्यक्त हुआ है, अत: यहाँ भी अन्योति है ।

उपमेयोपमा अलंकार (Upmeyopma Alankar) उपमेयोपमा में उपमेय और उपमान की एक-दूसरे से उपमा दी जाती है। जैसे- मुख-सा चन्द्र और चन्द्र-सा मुख है।’ इस वाक्य में मुख और चन्द्र परस्पर एक-दूसरे के उपमेय तथा उपमान हैं । उदाहरण-

  1. तौ मुख सोहत है ससि सो अरु सोहत है ससि तो मुख जैसो ।
  2. सुन्दर नन्दकिशोर से सुन्दर नन्दकिशोर ।
  3. अब यद्यपि दुर्बल भारत है, पर भारत के सम भारत है ।

प्रतिवस्तूपमा अलंकार (Prativastupma Alankar) इस अलंकार में अन्तर्निहित समानता वाले दो वाक्यों में एक सामान्य धर्म का अलग शब्दों में कथन किया जाता है । इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि प्रतिवस्तूपमा में एक ही साधारण धर्म की, उपमान वाक्य और उपमेय वाक्य- दोनों वाक्यों में दो बार स्थिति होती है । प्रतिवस्तूपमा का शाब्दिक अर्थ है-प्रतिवस्तु अर्थात् प्रत्येक वाक्य के अर्थ में उपमा (सादृश्य या समानता) हो । इस अलंकार में दो वाक्य रहते हैं, एक उपमेय वाक्य तथा दूसरा उपमान वाक्य, परन्तु इन दोनों वाक्यों में सादृश्य का स्पष्ट कथन नहीं होता, वह व्यंजित होता है । इन दोनों वाक्यों में साधारण धर्म एक ही होता है, परन्तु उसे अलग-अलग ढंग से कहा जाता है । उदाहरण-

‘राजत मुख मृदु बानि सों, लसत सुधा सों चन्द ।
निर्झर सों नीको सु गिरि, मद सों भली गयन्द ।

यहाँ ‘राजत’ और ‘लसत’, ‘नीको’ और ‘भलो’ समान धर्म अलग-अलग शब्दों में कहे गये हैं ।

‘चटक न छाँड़त घटत हू, सज्जन नेह गँभीर ।
फीको परे न बरु फटे, रंग्यो चोल रैंग चीर ।

यहाँ ‘चटक न छाँडत’ तथा ‘फीको परै न ‘ में केवल शब्दों का ही अन्तर है, दोनों के अर्थ में समानता है । अत: यहाँ भी प्रतिवस्तूपमा है ।

दृष्टांत अलंकार (Drishtant Alankar) – इस अलंकार में उपमेय तथा उपमान, दोनों वाक्यों में उपमान, उपमेय तथा साधारण धर्म का बिम्ब-प्रतिबिम्ब-भाव झलकता है । । उदाहरण-

‘निरखि रूप नंदलाल को, दूगनि रुचै नहिं आन ।
तजि पियूष कोऊ करत, कटु औषधि को पान ।’

यहाँ प्रथम (बिम्ब) वाक्य का प्रतिबिम्ब दूसरे वाक्य में झलकता है ! जिन ऑखों ने नन्दलाल को देख लिया है, उन्हें भला और कोई अच्छा कैसे लग सकता है ? क्या अमृत (पीयूष) को त्याग कर कोई कड़वी (कटु) औषधि (दवा) पसन्द करेगा ?

अथांन्तरन्यास अलंकार (Athantarnyas Alankar) इस अलंकार में साधम्र्य और वैधम्र्य की दृष्टि से सामान्य का विशेष द्वारा और विशेष का सामान्य द्वारा समर्थन किया जाता है । अर्थात् कारण से कार्य का तथा कार्य से कारण का जहाँ समर्थन हो, वहाँ अथांन्तरन्यास अलंकार होता है । उदाहरण-

‘रहिमन नीच कुसंग सों, लगत कलंक न काहि ।
दूध कलारी कर लखै, को मद जाने नाहि ।’

यहाँ सामान्य (नीच कुसंग) का ‘दूध कलारी’ के विशेष प्रसंग से समर्थन है और ‘लगत’ तथा ‘जाने’ दोनों क्रियाएँ साधम्र्य से कही गयी हैं ।

उल्लेख अलंकार (Ullekh Alankar) जहाँ किसी एक वस्तु को अनेक रूपों में ग्रहण किया जाय, तो उसके इस प्रकार अनेक रूपों में कथन को उल्लेख कहा जायेगा । एक वस्तु का, ज्ञाताओं के भेद के कारण अथवा विषयभेद के कारण, अनेक रूपों में वर्णन किया जाना उल्लेख अलंकार है । उदाहरण-

‘विन्दु में थीं तुम सिन्धु अनन्त एक सुर में समस्त संगीत ।

एक कलिका में अखिल वसन्त धरा पर थीं तुम स्वर्ग पुनीत ।’

काव्यलिंग अलंकार (Kavyaling Alankar) काव्य में किसी बात को सिद्ध करने के लिए जहाँ युक्ति अथवा कारण का कथन करके उसका समर्थन किया जाय, वहाँ काव्यलिंग अलंकार होता है ।

उदाहरण-

‘मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय ।
जा तन की झाँई परै, स्याम हरित दुति होय ।’

यहाँ प्रशंसा की समर्थता का कारण दूसरे वाक्य में कहा गया है ।

‘स्याम गौर किमि कहीं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥”

इसमें पूर्वाद्ध का समर्थन उत्तरार्द्ध के वाक्यार्थ में प्रस्तुत युक्ति के द्वारा किया गया है।

विरोधाभास अलंकार (Virodhabhas Alankar) जिस वर्णन में वस्तुत: विरोध न रहने पर भी विरोध का आभास हो, उसमें विरोधाभास अलंकार होता है । उदाहरण-




‘आग हूँ जिससे ढूलकते बिन्दु हिमजल के ।
शून्य हूँ जिसमें बिछे हैं पाँवड़े पलकें ।’

‘आग’ से हिमजल बिन्दु का ढूलकना तथा ‘शून्य’ में पलक-पाँवड़ों का बिछना दोनों में विरोधाभास है ।

‘पर अथाह पानी रखता है यह सूखा-सा गात्र ।’
यहाँ ‘सूखे-से गात्र का अथाह पानी रखना’ विरोध का सूचक है, अत: यहाँ विरोधाभास है।

स्वभावोति अलंकार (Svabhavokti Alankar)  जो वस्तु जैसी हो उसका ठीक-ठीक वैसा ही वर्णन स्वभावोक्ति

अलंकार कहलाता है । इस वर्णन को पढ़ते या सुनते ही पाठक या श्रोता के समक्ष वर्णित वस्तु साकार उपस्थित हो जाती है । उदाहरण–

सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
इहि बानिक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल ।

यहाँ ‘बिहारीलाल’ श्रीकृष्ण के रूप का स्वाभाविक वर्णन है ।

सिखवति चलन जसोदा मैया ।
अरबराई कर पानि गहावत, डगमगाई धरनी धरे पैया ।

यहाँ भी माता-पुत्र का सहज स्वाभाविक वर्णन है, अत: यह स्वभावोक्ति है ।