Svabhavokti Alankar in Hindi Grammar | स्वभावोक्ति अलंकार

स्वभावोक्ति अलंकार (Svabhavokti Alankar)

जो वस्तु जैसी हो उसका ठीक-ठीक वैसा ही वर्णन स्वभावोक्ति

अलंकार कहलाता है । इस वर्णन को पढ़ते या सुनते ही पाठक या श्रोता के समक्ष वर्णित वस्तु साकार उपस्थित हो जाती है । उदाहरण–

सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
इहि बानिक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल ।

यहाँ ‘बिहारीलाल’ श्रीकृष्ण के रूप का स्वाभाविक वर्णन है ।

सिखवति चलन जसोदा मैया ।
अरबराई कर पानि गहावत, डगमगाई धरनी धरे पैया ।

यहाँ भी माता-पुत्र का सहज स्वाभाविक वर्णन है, अत: यह स्वभावोक्ति है ।

Virodhabhas Alankar in Hindi Grammar | विरोधाभास अलंकार

Virodhabhas Alankar (विरोधाभास अलंकार)

जिस वर्णन में वस्तुत: विरोध न रहने पर भी विरोध का आभास हो, उसमें विरोधाभास अलंकार होता है । उदाहरण-

‘आग हूँ जिससे ढूलकते बिन्दु हिमजल के ।
शून्य हूँ जिसमें बिछे हैं पाँवड़े पलकें ।’

‘आग’ से हिमजल बिन्दु का ढूलकना तथा ‘शून्य’ में पलक-पाँवड़ों का बिछना दोनों में विरोधाभास है ।

‘पर अथाह पानी रखता है यह सूखा-सा गात्र ।’
यहाँ ‘सूखे-से गात्र का अथाह पानी रखना’ विरोध का सूचक है, अत: यहाँ विरोधाभास है।

Kavyaling Alankar in Hindi Grammar | काव्यलिंग अलंकार

Kavyaling Alankar (काव्यलिंग अलंकार)

काव्य में किसी बात को सिद्ध करने के लिए जहाँ युक्ति अथवा कारण का कथन करके उसका समर्थन किया जाय, वहाँ काव्यलिंग अलंकार होता है ।

उदाहरण-

‘मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय ।
जा तन की झाँई परै, स्याम हरित दुति होय ।’

यहाँ प्रशंसा की समर्थता का कारण दूसरे वाक्य में कहा गया है ।

‘स्याम गौर किमि कहीं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥”

इसमें पूर्वाद्ध का समर्थन उत्तरार्द्ध के वाक्यार्थ में प्रस्तुत युक्ति के द्वारा किया गया है।

Ullekh Alankar in Hindi Grammar | उल्लेख अलंकार

Ullekh Alankar (उल्लेख अलंकार)

जहाँ किसी एक वस्तु को अनेक रूपों में ग्रहण किया जाय, तो उसके इस प्रकार अनेक रूपों में कथन को उल्लेख कहा जायेगा । एक वस्तु का, ज्ञाताओं के भेद के कारण अथवा विषयभेद के कारण, अनेक रूपों में वर्णन किया जाना उल्लेख अलंकार है । उदाहरण-

‘विन्दु में थीं तुम सिन्धु अनन्त एक सुर में समस्त संगीत ।

एक कलिका में अखिल वसन्त धरा पर थीं तुम स्वर्ग पुनीत ।’

Athantarnyas Alankar in Hindi Grammar | अथांन्तरन्यास अलंकार

Athantarnyas Alankar (अथांन्तरन्यास अलंकार)


इस अलंकार में साधम्र्य और वैधम्र्य की दृष्टि से सामान्य का विशेष द्वारा और विशेष का सामान्य द्वारा समर्थन किया जाता है । अर्थात् कारण से कार्य का तथा कार्य से कारण का जहाँ समर्थन हो, वहाँ अथांन्तरन्यास अलंकार होता है । उदाहरण-

‘रहिमन नीच कुसंग सों, लगत कलंक न काहि ।
दूध कलारी कर लखै, को मद जाने नाहि ।’

यहाँ सामान्य (नीच कुसंग) का ‘दूध कलारी’ के विशेष प्रसंग से समर्थन है और ‘लगत’ तथा ‘जाने’ दोनों क्रियाएँ साधम्र्य से कही गयी हैं ।