Anupras Alankar in Hindi Grammar | अनुप्रास अलंकार

अनुप्रास अलंकार (Anupras Alankar)

वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं। आवृत्ति का अर्थ है, दुहराना। इस अलंकार में किसी वर्ण या व्यंजन की एक बार या अनेक वणों या व्यंजनों की अनेक धार आवृत्ति होती है ।

उदाहरण -वर्ण की एक बार आवृत्ति:

हैं जनम लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता ।

इसकी पहली पत्ति में ‘ज’ की एक बार आवृत्ति तथा दूसरी पत्ति में ‘प’ की भी एक ही बार आवृत्ति हुई है ।

एक वर्ण की अनेक बार आवृति :

‘तरनि तनुजा तट-तमाल तरुवर बहु छाए।’
इसमें ‘त’ की अनेक बार आवृत्ति हुई है।

अनुप्रास में वणाँ की आवृत्ति का भी एक नियम है । या तो वे शब्द के प्रारंभ में, या मध्य में या अन्त में आते हैं, तभी अनुप्रास माने जायेंगे अन्यथा नहीं ।

अनुप्रास अलंकार के तीन भेद हैं (Anupras Alankar ke Bhed)

(1) वृत्यनुप्रास
(2) छेकानुप्रास तथा
(3) लाटानुप्रास ।

अनुप्रास अलंकार के कुछ और उदाहरण :

(क) दिनान्त था थे दिननाथ डूबते ।
सधेनु आते गृह ग्वाल-बाल थे ।। (‘दन’ तथा ‘ल’ की आवृत्ति)

(ख) मुदित महीपति मंदिर आए । सेवक सचिव सुमंत बुलाए ।
(‘म’ तथा ‘स’ की आवृत्ति)

सबै सहायक सबल कै, कोउ न निबल सहाय ।
पवन जगावत आग को दीपहिं देत बुझाय ।

कारज धीरे होतु है, काहे होत अधीर ।
समय पाय तरुवर फलैं, केतक सींचौ नीर ।

(ड) बड़ सुख सार पाओल तुआ तीरे ।
छोडइत निकट नयन बह नीरे ।

(च) जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहि विलोकत पातक भारी ।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्रक दुख रज मेरु समाना ।

(छ) प्रभुजी तुम दीपक हम बाती,
जाकी जोति बरे दिन राती ।

(ज) माधव कत तोर करब। बड़ाई ।
उपमा तोहर कहब ककरा हम, कहितहुँ अधिक लजाई ।

(झ) जय जय भारत-भूमि-भवानी !
अमरों ने भी तेरी महिमा बारंबार बखानी ।

(ज) फूली सरसों ने दिया रंग, मधु लेकर आ पहुँचा, अनंग,
वधू-वसुधा पुलकित अंग अंग, हैं वीर वेश में किन्तु कंत ।

(ट) अधर धरत हरि को परत होठ दीठि पट जोति ।
हरित रंग की बाँसुरी इन्द्र धनुष दुति होति ।

2 comments
  1. Bri make it in easy language not that hard to understand

    1. Sure Arsh. Thanks for your input. We will try to make it easier to understand.

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