Atishyokti Alankar (अतिशयोक्ति अलंकार)

अतिशयोक्ति का शाब्दिक अर्थ है अतिशय + उत्ति अर्थात् बढ़ा-चढ़ाकर किया गया कथन । उपमेय को छिपाकर उपमान के साथ उसकी आभन्नता (या समरूपता) की प्रतीति कराना ही अतिशयोक्ति अलकार है । इसमें उपमेय का नामोल्लेख तक नहीं किया जाता, अपितु उपमान के द्वारा ही उसकी प्रतीति कराई जाती है।

उदाहरण-

बाँधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से ।
मणिवाले फणियों का मुख, क्यों भरा हुआ हीरों से ।

इन पंक्तियों में कवि ने मोतियों से भरी हुई प्रिया की माँग का वर्णन किया है ।

विधु (चन्द्र) से मुख का, काली जंजीरों से बालों का तथा मणिवाले फणियों से मोती भरी माँग की प्रतीति होती है । इन पंक्तियों में उपमेय मुख, बाल तथा माँग का नामोल्लेख तक नहीं है । उपमानों (विधु, काली जंजीरों तथा मणिवाले फणियों) से ही उपमेय की प्रतीति होती है ।

अन्योक्ति जब कोई बात सीधे-सीधे न कहकर घुमा-फिराकर कही जाती है, तब वहाँ अन्योति अलंकार होता है । अन्योति को ही पर्यायोति के नाम से भी जाना जाता है । इसमें वक्ता को जो कुछ भी कहना होता है, उसे सीधे-सादे ढंग से स्पष्ट रूप से न कहकर घुमा-फिराकर कहा जाता है । जैसे-किसी आगन्तुक से जब यह कहा जाता है’आपने कैसे कृपा की ?’ तब वक्ता का अभीष्ट अर्थ यह पूछना होता है कि ‘आप किस मतलब से आये हैं ?’

उदाहरण-

नहिं पराग नहीं मधुर मधु नहिं विकास इहिं काल ।
अली कली ही सौं बंध्यौ, आगे कौन हवाल ।

इस दोहे में कली और भेंवरे के माध्यम से नवविवाहित राजा जयसिंह को अपने कर्तव्य का स्मरण कराया गया है ।

‘तुलसी अवलम्ब न और कछू लरिका केहि भाँति जिआइहौं जू ।
बरु मारिये मोहिं बिना पग धोये हौं नाथ न नाव चढ़ाइहौं जू ॥

इन पत्तियों में केवट का इष्टार्थ प्रकारान्तर से व्यक्त हुआ है, अत: यहाँ भी अन्योति है ।

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