Drishtant Alankar (दृष्टांत अलंकार)

इस अलंकार में उपमेय तथा उपमान, दोनों वाक्यों में उपमान, उपमेय तथा साधारण धर्म का बिम्ब-प्रतिबिम्ब-भाव झलकता है । । उदाहरण-

‘निरखि रूप नंदलाल को, दूगनि रुचै नहिं आन ।
तजि पियूष कोऊ करत, कटु औषधि को पान ।’

यहाँ प्रथम (बिम्ब) वाक्य का प्रतिबिम्ब दूसरे वाक्य में झलकता है ! जिन ऑखों ने नन्दलाल को देख लिया है, उन्हें भला और कोई अच्छा कैसे लग सकता है ? क्या अमृत (पीयूष) को त्याग कर कोई कड़वी (कटु) औषधि (दवा) पसन्द करेगा ?

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