Prativastupma Alankar (प्रतिवस्तूपमा अलंकार)

इस अलंकार में अन्तर्निहित समानता वाले दो वाक्यों में एक सामान्य धर्म का अलग शब्दों में कथन किया जाता है । इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि प्रतिवस्तूपमा में एक ही साधारण धर्म की, उपमान वाक्य और उपमेय वाक्य- दोनों वाक्यों में दो बार स्थिति होती है । प्रतिवस्तूपमा का शाब्दिक अर्थ है-प्रतिवस्तु अर्थात् प्रत्येक वाक्य के अर्थ में उपमा (सादृश्य या समानता) हो । इस अलंकार में दो वाक्य रहते हैं, एक उपमेय वाक्य तथा दूसरा उपमान वाक्य, परन्तु इन दोनों वाक्यों में सादृश्य का स्पष्ट कथन नहीं होता, वह व्यंजित होता है । इन दोनों वाक्यों में साधारण धर्म एक ही होता है, परन्तु उसे अलग-अलग ढंग से कहा जाता है । उदाहरण-

‘राजत मुख मृदु बानि सों, लसत सुधा सों चन्द ।
निर्झर सों नीको सु गिरि, मद सों भली गयन्द ।

यहाँ ‘राजत’ और ‘लसत’, ‘नीको’ और ‘भलो’ समान धर्म अलग-अलग शब्दों में कहे गये हैं ।

‘चटक न छाँड़त घटत हू, सज्जन नेह गँभीर ।
फीको परे न बरु फटे, रंग्यो चोल रैंग चीर ।

यहाँ ‘चटक न छाँडत’ तथा ‘फीको परै न ‘ में केवल शब्दों का ही अन्तर है, दोनों के अर्थ में समानता है । अत: यहाँ भी प्रतिवस्तूपमा है ।

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