Rupak Alankar (रूपक अलंकार)

उपमेय में उपमान के निषेधरहित आरोप को रूपक अलंकार कहते हैं।

इसमें अत्यधिक समानता के कारण प्रस्तुत (उपमेय) में अप्रस्तुत (उपमान) का आरोप करके दोनों में अभिन्नता अथवा समानता दिखायी जाती है । ‘रूपक’ का कोशीय अर्थ हैएकता अथवा अभेद की प्रतीति ।

उदाहरण- ‘बीती विभावरी जाग री |

अम्बर-पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा-नागरी ।

यहाँ अम्बर में पनघट, तारा में घट तथा ऊषा में नागरी (नायिका) का आरोप है, अत: इस पंक्ति  में रूपक अलंकार है ।

रूपक अलंकार के तीन मुख्य भेद हैं-

  1. सांग रूपक,
  2. निरंग रूपक तथा
  3. परम्परित रूपक । ऊपर के उदाहरण में सांग रूपक अलंकार है ।
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