स्वभावोक्ति अलंकार (Svabhavokti Alankar)

जो वस्तु जैसी हो उसका ठीक-ठीक वैसा ही वर्णन स्वभावोक्ति

अलंकार कहलाता है । इस वर्णन को पढ़ते या सुनते ही पाठक या श्रोता के समक्ष वर्णित वस्तु साकार उपस्थित हो जाती है । उदाहरण–

सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
इहि बानिक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल ।

यहाँ ‘बिहारीलाल’ श्रीकृष्ण के रूप का स्वाभाविक वर्णन है ।

सिखवति चलन जसोदा मैया ।
अरबराई कर पानि गहावत, डगमगाई धरनी धरे पैया ।

यहाँ भी माता-पुत्र का सहज स्वाभाविक वर्णन है, अत: यह स्वभावोक्ति है ।

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