Utpreksha Alankar (उत्प्रेक्षा अलंकार)

जहाँ प्रस्तुत में अप्रस्तुत की सम्भावना होती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । उपमा अलंकार की तरह उत्प्रेक्षा अलंकार में भी कहीं वाचक शब्द रहता है और कहीं नहीं भी रहता है । इसके वाचक शब्द हैं- मनु, इव, मानो, जानो इत्यादि ।

जहाँ वाचक शब्द होता है, वहाँ वाच्या उत्प्रेक्षा होती है । जहाँ वाचक नहीं होता, वहाँ प्रतीयमाना या गम्या उत्प्रेक्षा होती ।

उत्प्रेक्षा अलंकार के भी अनेक भेद-प्रभेद हैं । परन्तु इसके तीन मुख्य भेद हैं-

  1. वस्तृत्प्रेक्षा अलंकार
  2. फलोत्प्रेक्षा अलंकार तथा
  3. हेतृत्प्रेक्षा अलंकार ।

उदाहरण :

सोहत ओढे . पीतु पटु, स्याम सलौने गात

मनौ नीलमनि सैल पर, आतपु रयो प्रभात

यहाँ पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण पर नीलमणि पर्वत पर प्रात:कालीन धूप का आरोप है। यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है ।

लता भवन ते प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ ।

निकसे मनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ

लता-भवन से दोनों भाइयों (राम-लक्ष्मण) के निकलने पर बादलों के पटल (पर्दा) से दो चन्द्रमाओं के निकलने का आरोप है । अत: यहाँ भी उत्प्रेक्षा अलंकार है । इन दोनों उदाहरणों में वाचक शब्दों (मनी, मनु) का भी कथन है, अत: इनमें वाच्या उत्प्रेक्षा है ।

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2 Comments on Utpreksha Alankar in Hindi Grammar | उत्प्रेक्षा अलंकार

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