Vkroti Alankar in Hindi Grammar | वक्रोति अलंकार

Vkroti Alankar (वक्रोति अलंकार)

यदि वक्ता के कथन में उसके अभिप्रेत अर्थ के बदले श्रोता श्लेष या काकु से दूसरा अर्थ ग्रहण करे, तो वक्रोक्ति अलंकार होता है ।

वक्रोक्ति (वक्र + उक्ति) का सहज अर्थ है- टेढ़ा कथन ।

कहनेवाला किसी दूसरे अभिप्राय से जो कुछ कहे, सुननेवाला उसका दूसरा ही-वक्ता के अभिप्राय से सर्वथा भिन्न अर्थ समझ ले तो वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है ।

ऐसी अवस्था दो कारणों से संभव होती है-

(1) श्लेष की सहायता से तथा
(2) काकु की सहायता से ।

जब श्लिष्ट शब्दों से अनेक अर्थों का बोध होता है, तब वहाँ श्लेष अलंकार होता है । ‘श्लिष्ट’ शब्द का अर्थ है मिला हुआ, चिपका हुआ या सटा हुआ । अत: श्लिष्ट शब्द का सामान्य अर्थ होता है ऐसा शब्द, जिसमें अनेक अर्थ मिले हुए या चिपके हुए हों।

उदाहरण-

‘रहिमन’ पानी राखिये बिन पानी सब सून।
पानी गये न उबरे, मोती, मानुस, चून ।

यहाँ एक ही शब्द ‘पानी’ का चमक, प्रतिष्ठा और जल- ये तीन अर्थ हैं, जिनका तम्बन्ध क्रमश: मोती, मनुष्य और चूना से होता है । अत: इस दोहा में श्लेष अलंकार है।

काकु का अर्थ है ध्वनि का विकार । काकु से किसी कथन के अर्थ में बड़ा भारी अन्तर आ जाता है। इसमें वक्ता के वाक्य से अर्थात् कण्ठध्वनि की विशेषता से श्रोता द्वारा अन्य अर्थ कल्पित कर लिया जाता है । इस प्रकार जो वक्रोक्ति श्लेष के द्वारा होती है, उसे श्लेष वक्रोक्ति तथा जो वक्रोक्ति काकु की सहायता से होती है, उसे काकु वक्रोक्ति कहते हैं ।

श्लेष वक्रोति के दो भेद हैं-
(1) सभग श्लेष वक्रोक्ति तथा
(2) अभग श्लेष वक्रोक्ति ।

उदाहरण (सभंग श्लेष वक्रोक्ति) :

अयि गौरवशालिनी, मानिनी, आज सुधास्मित क्यों बरसाती नहीं?
निज कामिनी को प्रिय, गौ अवशा अलिनी भी कभी कहि जाती कहीं ।’

इस छन्द में ‘गौरवशालिनी’ पद को ‘गी’, ‘अवशा’ और ‘अलिनी’ में भंग करके श्लेषार्थ निकलता है ।

उदाहरण (अभंग श्लेष वक्रोक्ति) :
‘एक कबूतर देख हाथ में पूछा कहाँ अपर है ?
उसने कहा अपर कैसा ? उड़ है गया। सपर है ।
इस छन्द में ‘अपर’ का अर्थ वक्ता के अनुसार ‘दूसरा’ है, जबकि श्रोता ने श्लेष की सहायता से अपर का अर्थ ‘पर-रहित’ लिया है ।

उदाहरण (काकु वक्रोक्ति) :

कोउ नृप होहिं हमहिं का हानी । चेरी छाँड़ि अब होब कि रानी ।

इस छन्द में काकु द्वारा यह समझाया जा रहा है कि किसी के राजा बनने या न बनने से वक्ता का कुछ भी बनने या बिगड़नेवाला नहीं है। हानि-लाभ तो उसी को झेलना है, जिससे यह बात कही जा रही है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.