सकर्मक क्रिया (Sakarmak Kriya in Hindi Vyakaran)

जिस क्रिया के कार्य का फल कर्ता पर न पड़कर किसी दूसरी जगह पड़ता हो, तो उसे सकर्मक क्रिया (Sakarmak Kriya)कहते हैं ।




सकर्मक क्रिया के साथ कर्म (कारक) रहता है या उसके साथ रहने की संभावना रहती है। इसीलिए इसे ‘सकर्मक” क्रिया कहा जाता है ।
सकर्मक अर्थात् कर्म के साथ
जैसे– राम खाना खाता है । इस वाक्य में खानेवाला राम है, लेकिन उसकी क्रिया ‘खाना’ (खाता है) का फल ‘खाना’ (भोजन) पर पड़ता है।
एक और उदाहरण लें– वह जाता है । इस वाक्य में भी ‘जाना’ (जाता है) क्रिया सकर्मक है, क्योंकि इसके साथ किसी कर्म का शब्दत: उल्लेख न रहने पर भी कर्म की संभावना स्पष्ट रूप से प्रतीत होती है । ‘जाता है’ के पहले कर्म के रूप में किसी स्थान जैसे-घर, विद्यालय या पटना जैसे गन्तव्य स्थान की संभावना स्पष्ट है ।




कुछ क्रियाएँ अकर्मक और सकर्मक दोनों होती हैं । वाक्य में प्रयोग के आधार पर उनके अकर्मक या सकर्मक होने का ज्ञान होता है । जैसे
अकर्मक: उसका शरीर खुजला रहा है ।
सकर्मक: वह अपना शरीर खुजला रहा है ।
अकर्मक: मेरा जी घबराता है ।
सकर्मक: मुसीबत किसी को भी घबरा देती है ।

क्रिया एवं क्रिया के भेद (Kriya in Hindi Grammar, Kriya ke bhed in Hindi Grammar)




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